हरणी में नहीं जलती होली, होती है चांदी की होली और सोने के प्रहलाद की पूजा
भीलवाड़ा (प्रहलाद तेेेली) । प्रदेश भर में जहां होलिका दहन के साथ बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व हर्षोल्लास से मनाया जाता है, वहीं भीलवाड़ा के निकटवर्ती हरणी गांव ने एक ऐसी मिसाल कायम की है जो न केवल अनूठी है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का बड़ा संदेश भी देती है। यहां पिछले 70 वर्षों से लकड़ी की होली जलाने की परंपरा को त्याग कर सोने के भक्त प्रहलाद और चांदी की होलिका की पूजा की जा रही है।
70 साल पहले विवाद ने बदली परंपरा
ग्रामीणों के अनुसार, करीब सात दशक पहले गांव में होली के लिए पेड़ काटने को लेकर गहरा विवाद हुआ था, जिसके बाद आगजनी की घटना भी हुई। इस तनावपूर्ण स्थिति के बाद ग्रामवासियों ने सामूहिक रूप से निर्णय लिया कि भविष्य में होली के लिए न तो पेड़ काटे जाएंगे और न ही होलिका दहन किया जाएगा। इसी निर्णय के फलस्वरूप ग्रामीणों ने चंदा एकत्रित कर लगभग 250 ग्राम चांदी की होलिका और सोने के भक्त प्रहलाद की प्रतिमा बनवाई।
गाजे-बाजे के साथ निकलती है शोभायात्रा
परंपरा के अनुसार, होली के दिन इन बहुमूल्य विग्रहों का विशेष श्रृंगार किया जाता है। चांदी की होलिका की गोद में सोने के प्रहलाद को बैठाकर उन्हें थाली में सजाया जाता है। इसके बाद ढोल-धमाकों और गाजे-बाजे के साथ पूरे गांव में भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। शोभायात्रा निर्धारित होलिका दहन स्थल पर पहुंचती है, जहां विद्वान पंडितों द्वारा मंत्रोच्चार के साथ प्रतीकात्मक पूजा संपन्न कराई जाती है। पूजन के पश्चात इन प्रतिमाओं को पुनः सुरक्षित रूप से चारभुजा मंदिर में प्रतिष्ठित कर दिया जाता है।
पर्यावरण और आस्था का संगम
ग्रामीण गोपालाल शर्मा ने बताया कि इस परंपरा से प्रकृति का दोहन रुक गया है। यदि यह व्यवस्था न होती, तो गांव में तीन से चार स्थानों पर होली जलाई जाती, जिससे भारी मात्रा में लकड़ियों की खपत होती और पर्यावरण को नुकसान पहुंचता। हरणी गांव की यह पहल आज के दौर में 'ग्रीन होली' का जीवंत उदाहरण पेश कर रही है।