भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों द्वारा शेयरधारकों को दिए जाने वाले लाभांश को लेकर नया प्रस्ताव जारी किया है। इसके तहत अब बैंक अपने शुद्ध लाभ का 75 प्रतिशत से अधिक हिस्सा डिविडेंड के रूप में नहीं बांट सकेंगे। वहीं क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के लिए यह सीमा 80 प्रतिशत तय की गई है। आरबीआई का मानना है कि इससे बैंकों की वित्तीय मजबूती बनी रहेगी और भविष्य की जरूरतों के लिए पर्याप्त पूंजी सुरक्षित रहेगी।
यह प्रस्ताव सभी भारतीय बैंकों और भारत में काम कर रही विदेशी बैंकों की शाखाओं पर लागू होगा। आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि लाभांश देने के लिए बैंक का शुद्ध लाभ में होना जरूरी होगा। साथ ही बैंक के निदेशक मंडल की दीर्घकालिक रणनीति और पूंजी प्रबंधन योजना को भी अहम माना जाएगा।
केंद्रीय बैंक के अनुसार बैंकों को लाभांश वितरण से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी पूंजी पर्याप्त है और भविष्य के जोखिमों से निपटने की क्षमता बनी रहे। इस कदम को बैंकिंग प्रणाली को मजबूत करने और अस्थिरता से बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि नए नियमों से बैंकों पर अनुशासन बढ़ेगा और वे केवल तात्कालिक लाभ के बजाय दीर्घकालिक स्थिरता पर ध्यान देंगे। हालांकि कुछ निवेशकों के लिए इससे डिविडेंड में कमी आ सकती है, लेकिन समग्र रूप से इसे बैंकिंग सेक्टर के हित में माना जा रहा है।