कोटड़ी चारभुजानाथ मंदिर में होली पर 100 साल बाद चंद्र ग्रहण का साया, 3 मार्च को 9 घंटे बंद रहेंगे ठाकुर जी के पट
आकोला (रमेश चंद्र डाड)। मेवाड़ के सुप्रसिद्ध आस्था धाम श्री कोटड़ी चारभुजा नाथ मंदिर में इस वर्ष होली का पर्व खगोलीय घटनाक्रम और अटूट श्रद्धा के अनूठे संगम के बीच मनाया जाएगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, होली पर इस बार दृश्यमान चंद्र ग्रहण का दुर्लभ संयोग लगभग एक शताब्दी (100 वर्ष) के अंतराल के बाद बन रहा है। इस विशेष परिस्थिति के कारण मंदिर के पारंपरिक कार्यक्रमों और दर्शन समय में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं।
2 मार्च: फाल्गुनी उल्लास के साथ होगा होलिका दहन
मंदिर परंपरा के अनुसार, 2 मार्च (सोमवार) को फाल्गुन पूर्णिमा के उपलक्ष्य में भगवान चारभुजा नाथ का विशेष मनमोहक श्रृंगार किया जाएगा। संध्या आरती के पश्चात रात्रि 7:15 बजे मंदिर परिसर में विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ होलिका दहन का भव्य कार्यक्रम आयोजित होगा। इस दौरान बड़ी संख्या में क्षेत्रीय श्रद्धालुओं के उपस्थित रहने की संभावना है।
3 मार्च: चंद्र ग्रहण का सूतक और मंदिर की मर्यादा
श्री चारभुजा मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष सुदर्शन गाड़ोदिया ने बताया कि 3 मार्च (मंगलवार) को भारत में दृश्यमान चंद्र ग्रहण होने के कारण सूतक काल प्रभावी रहेगा। शास्त्रों की मर्यादा और मंदिर की पवित्रता को ध्यान में रखते हुए मंदिर के पट प्रातः 9:45 बजे से सायं 6:45 बजे तक (कुल 9 घंटे) पूरी तरह बंद रहेंगे। इस अवधि के दौरान भगवान की मूर्तियों के स्पर्श, पूजा-अर्चना और दर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा।
भक्तों से अपील: 4 मार्च को दर्शन करना रहेगा श्रेष्ठ
ट्रस्ट अध्यक्ष गाड़ोदिया ने विशेष जानकारी देते हुए बताया कि 3 मार्च को सायं 6:45 बजे ग्रहण मोक्ष के पश्चात संपूर्ण मंदिर का शुद्धिकरण किया जाएगा। भगवान का गंगाजल से अभिषेक और विशेष शुद्धि आरती की जाएगी। इस लंबी धार्मिक प्रक्रिया के कारण उस दिन भक्तों को दर्शन के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाएगा। अतः उन्होंने बाहर से आने वाले पदयात्रियों और दूर-दराज के श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे किसी भी प्रकार की असुविधा से बचने के लिए 4 मार्च (बुधवार) को दर्शन हेतु कोटड़ी पधारें।
क्यों प्रभावी रहता है सूतक?
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, चंद्र ग्रहण के दौरान चंद्रमा की किरणें दूषित हो जाती हैं, जिसका सीधा प्रभाव प्राण-प्रतिष्ठित मूर्तियों और प्रकृति पर पड़ता है। नकारात्मक ऊर्जा से बचाव के लिए सूतक काल में मूर्तियों को वस्त्रों से ढका जाता है और पूजा वर्जित रहती है। ग्रहण समाप्त होने के बाद मंदिर के शुद्धिकरण के पश्चात ही पुनः जनसामान्य के लिए दर्शन प्रारंभ किए जाते हैं।
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