भवभ्रमण का अंत लाता है चारित्र धर्म :आचार्य रत्नदेव

Update: 2025-11-02 12:53 GMT



उदयपुर । जैनाचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वरजी म. सा. की शुभ निश्रा में  महावीर विद्यालय - चित्रकूट नगर में भद्रंकर परिवार द्वारा आयोजित सामुहिक उपधान तप बडे उत्साह से चल रहा है।.

धर्मसभा में प्रवचन देते हुए जैनाचार्यश्री ने कहा कि -

वैज्ञानिक साधनों में समय को बचाने के अनेक उपाय हैं। वर्षों पहले जब विज्ञान के विशेष साधन नहीं थे, तब गृहकार्य में ही पूरा दिन बीत जाता था । आज विज्ञान के साधनों से व्यक्ति के कार्य खूब आसान हो गए हैं। परंतु बचे हुए समय का भक्षण करनेवाले टीवी, मोबाइल आदि ऐसे मनोरंजन के साधन भी विज्ञान ने ही दिये हैं।

हर व्यक्ति के लिए दिन के 24 घंटे एक समान होने पर भी आज व्यक्ति यही मानता है कि हमारे पास समय नहीं है।

एक दिन की विशुद्ध संयम की आराधना से जीवात्मा को मोक्ष अथवा वैमानिक देवलोक प्राप्त हो सकता है। चारित्र धर्म की आराधना । भवभ्रमण का अंत लाने में समर्थ है।अज्ञान कष्ट एवं त्याग, तप के द्वारा देवगति की प्राप्ति हो सकती है, परंतु मनुष्य के रुप में जन्म प्राप्त होना खूब कठिन है।मनुष्य-जन्म की प्राप्ति के बाद भी आर्यकुल, आर्यदेश, सद्धर्म की सामग्री, पांच इन्द्रियों की परिपूर्णता के साथ सद्-धर्म का श्रवण, उस धर्म पर श्रद्धा और धर्म आचरण अत्यंत ही दुर्लभ है।

आचार्य श्री ने कहा कि महावीर प्रभु को केवलज्ञान की प्राप्ति वैशाख सुदी 10 के दिन हुई थी, जबकि चतुर्विध संघ की स्थापना वैशाख सुदी-11 के दिन हुई थी । उसका मुख्य कारण यही था कि वैशाख सुद-10 के दिन समवसरण में एक भी आत्मा ऐसी नहीं थी जो सर्वविरतिधर्म स्वरूप चारित्र को स्वीकार कर सके। सर्व विरतिधर आत्माएँ होती हैं, तब तक शासन चलता है।

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