उदयपुर,। श्री जैन श्वेताम्बर महासभा के तत्वावधान में मंगलवार को तपागच्छ की उद्गम स्थली आयड़ तीर्थ स्थित 81 मंदिरों के शिखर पर ध्वजा परिवर्तन की गई। महासभा के महामंत्री कुलदीप नाहर ने बताया कि प्रात: 7 बजे में पार्श्व वल्लभ सेवा मण्डल की बहिनों द्वारा सत्तरभेदी स्नात्र पूजा, उसके बाद सत्तरभेदी पूजा पढ़ाई गई। ज्ञान भक्ति एवं ज्ञान पूजा, अष्ट प्रकार की पूजा-अर्चना की गई। उसके बाद सभी 81 मंदिरों के शिखर पर वार्षिक ध्वजा परिवर्तन की गई। जैसे-जैसे अलग-अलग मंदिर के शिखर पर ध्वजा चढ़ती रही वैसे-वैसे भगवानों के जयकारे लगते रहे। इस दौरान आयोजित धर्मसभा में संतों ने कहां कि दान-शील और तप के अभाव में भी भाव धर्म मोक्ष का कारण बन सकता है परन्तु भाव के अभाव में आदि धर्म भी निष्फल ही कहे गए हैं। जिस प्रकार से सिद्ध रस के संयोग से लोटा सोना बन जाता है। नमक के प्रयोग से भोजन स्वादिष्ट बन जाता है उसी प्रकार भाव के संयोग से धर्म मोक्ष रूपी लक्ष्मी प्रदान करने वाला होता है। जैसे कि संसार के भौतिक सुखों का त्याग किए बिना ही मुद्रिका से रहित अपनी अंगुली को देख- कर एक मात्र अनित्य भावना का विचार करते हुए भरत महाराजा को आरिसा भवन में केवलज्ञान की प्राप्ति हो गई थी। भावपूर्वक किया गया धर्म जीवात्मा को इसलोक और परलोक के सुख के लाभ के लिए होता है। 1 जीव बिना शरीर (कलेवर) का कोई मूल्य नहीं, सुगंध बिना फूल की कोई कीमत नहीं, । जड़ बिना वृक्ष का कोई अस्तित्व नहीं। बस इसी कारण भाव बिना धर्म नहीं। भाव रहित चाहे कितनी ही क्रियाएँ की जाय, वे क्रियाएँ कभी मोक्ष नहीं दे सकती। हमें हर आराधना भाव सहित करनी चाहिए।
इस अवसर पर उपाध्यक्ष भोपाल सिंह परमार, कुलदीप नाहर, अंकुर मुर्डिया, राजेश जावरिया, राजेन्द्र जवेरिया, सतीश कच्छारा, चत्तर सिंह पामेचा, राजेन्द्र कोठारी, अशोक जैन, रमेश सिरोया, श्याम हरकावत, नरेन्द्र चौधरी, अभय नलवाया, कुलदीप मेहता, दिनेश भण्डारी आदि मौजूद रहे। इस अवसर पर सभी धर्मावलम्बियों का स्वामीवात्सल्य का आयोजन किया गया।