जीते जी बेटी को खोने का दर्द: पिता ने लाडली को ‘मृत’ मानकर छपवाया शोक संदेश
Ai निर्मित
भीलवाड़ा।कभी जिस बेटी की किलकारियों से आंगन गूंजता था, उसी बेटी के फैसले ने एक पिता का जीवन सूना कर दिया। आमल्दा गांव में एक ऐसा मार्मिक घटनाक्रम सामने आया है, जिसने हर किसी के दिल को झकझोर दिया। एक पिता, जिसने अपनी बेटी को सपनों की ऊंचाइयों तक पहुंचाने का ख्वाब देखा था, आज उसी को अपनी जिंदगी से सदा के लिए विदा करने पर मजबूर हो गया।
देवेंद्र सिंह के लिए उनकी पुत्री आकांक्षा ही दुनिया थी। बड़े अरमानों के साथ उसे पढ़ने के लिए जयपुर भेजा गया था, इस उम्मीद के साथ कि वह परिवार का नाम रोशन करेगी। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। बेटी ने अपने दिल की राह चुनी और परिवार की इच्छाओं के विपरीत जाकर दूसरे समाज के युवक के साथ जीवन बिताने का फैसला कर लिया।
जब पुलिस थाने में पिता और बेटी आमने-सामने हुए, तो वह दृश्य किसी पत्थर दिल को भी पिघला सकता था। एक पिता अपनी लाडली के सामने झोली फैलाकर उसे घर लौट आने की गुहार लगाता रहा, अपनी इज्जत और परिवार की मर्यादा का वास्ता देता रहा। लेकिन बेटी अपने फैसले पर अडिग रही। पिता की आंखों से बहते आंसू और कांपती आवाज भी उसके इरादों को बदल न सकी।यही वह पल था, जब एक पिता भीतर से टूट गया। अपने जिंदा जिगर के टुकड़े को खो देने का दर्द सह न पाने पर उसने उसे ‘मृत’ मानने का कठोर निर्णय ले लिया। आकांक्षा के नाम से शोक संदेश छपवाया गया, जिसमें 20 मार्च 2026 को उसका ‘स्वर्गवास’ दर्शाया गया। 22 मार्च को तीये की बैठक और 31 मार्च को ब्रह्मभोज की घोषणा ने इस दर्द को और भी गहरा कर दिया।
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यह सिर्फ एक शोक संदेश नहीं, बल्कि एक पिता के टूटे हुए दिल की कहानी है — उस पीड़ा की, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। जहां एक ओर बेटी ने अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जीने का फैसला किया, वहीं दूसरी ओर पिता ने सामाजिक मान-सम्मान और अपनी भावनाओं के बीच झूलते हुए, अपनी ही संतान से नाता तोड़ लिया।
थाना अधिकारी पूरणमल मीणा के अनुसार युवती बालिग है और कानून उसे अपनी मर्जी से जीवन जीने का अधिकार देता है। पुलिस ने दोनों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन युवती अपने निर्णय पर कायम रही और उसने युवक के साथ रहने की इच्छा जताई। ऐसे में कानून भी उसके साथ खड़ा है। वहीं, परिजनों द्वारा शोक संदेश छपवाना पूरी तरह उनका निजी और भावनात्मक फैसला है।
यह घटना समाज के सामने कई सवाल छोड़ जाती है — क्या रिश्तों से बड़ा समाज है, या समाज से बड़ा एक पिता का दिल? जवाब शायद हर किसी के लिए अलग हो, लेकिन एक पिता के टूटे हुए मन की यह कहानी लंबे समय तक लोगों के दिलों में गूंजती रहेगी।
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