सनसनीखेज खुलासा:: श्मशान की चिताओं से निकलकर होटलों के तंदूर तक पहुँच रहा है 'मौत का कोयला'
पटना। बिहार की राजधानी समेत आस-पास के इलाकों में एक ऐसा घिनौना खेल चल रहा है जो इंसानियत और सेहत दोनों को शर्मसार कर देने वाला है। एक चौंकाने वाली जांच में सामने आया है कि श्मशान घाटों पर जलने वाली चिताओं की लकड़ियों से बने कोयले को गुपचुप तरीके से शहर के नामी होटलों, रेस्टोरेंट और लिट्टी-चोखा के स्टालों पर सप्लाई किया जा रहा है। व्यावसायिक गैस की किल्लत और बढ़ती कीमतों के बीच, यह 'चिता का कोयला' अब तंदूर की आग सुलगाने का सबसे सस्ता और सुलभ जरिया बन गया है।
एक राष्ट्रीय अखबार की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि चिता की आग बुझने के बाद कोयले को इकट्ठा किया जाता है। इसमें दो तरह की वैरायटी बेची जा रही है। एक 'मिक्स कोयला' जो 600 रुपये प्रति बोरी मिलता है, जिसमें हड्डियों के अंश रह जाते हैं। दूसरा 'स्पेशल कोयला' है, जिसकी कीमत 1000 रुपये प्रति बोरी तक वसूली जाती है। इस महंगे कोयले से इंसानी हड्डियों के टुकड़ों को चुन-चुनकर बाहर कर दिया जाता है ताकि होटल या रेस्टोरेंट में खाना बनाते समय किसी को शक न हो।
सावधान: क्या आपकी थाली में भी है 'चिता की आंच'? ऐसे पहचानें
श्मशान के कोयले के इस काले कारोबार के बीच उपभोक्ताओं के लिए यह पहचानना मुश्किल है कि उनका भोजन किस ईंधन पर पका है, लेकिन कुछ बुनियादी सावधानियों से जोखिम कम किया जा सकता है:कोयले की बनावट पर गौर करें: चिता की लकड़ी से बना कोयला बहुत हल्का और अंदर से खोखला होता है। यदि तंदूर के पास कोयला बहुत ज्यादा राख (सफेद पाउडर) छोड़ रहा है, तो वह लकड़ी का कोयला हो सकता है।खुले स्टालों से बचें: सड़क किनारे लगने वाले अस्थाई लिट्टी या भुट्टा स्टालों पर ईंधन का स्रोत संदिग्ध हो सकता है। कोशिश करें कि भरोसेमंद और साफ-सुथरी जगहों से ही भोजन लें।तंदूर की जांच: यदि संभव हो, तो देखें कि होटल में कॉमर्शियल गैस सिलेंडर या बिजली के तंदूर का उपयोग हो रहा है या नहीं। खुले में रखे कोयले की बोरियों पर नजर रखें।अजीब गंध: हालांकि मसालों के बीच गंध छिप जाती है, फिर भी यदि खाने में लकड़ी के जलने की सामान्य महक के बजाय कोई तीखी या अलग तरह की गंध आए, तो वह असुरक्षित हो सकता है।
नोट: यह केवल एक सुरक्षा परामर्श है। प्रशासन को चाहिए कि वह कोयले की सप्लाई चेन की औचक जांच करे ताकि जनता की सेहत और आस्था के साथ खिलवाड़ रुक सके।
शादियों और तंदूर में भारी डिमांड
जांच में खुलासा हुआ कि पटना के पांच प्रमुख घाटों से रोजाना करीब 400 किलो कोयला निकाला जा रहा है। एजेंटों के मुताबिक, तंदूर में पत्थर वाला कोयला इस्तेमाल करने से रोटियां जल जाती हैं, जबकि चिता की लकड़ी का कोयला अंदर से खोखला होने के कारण धीमी और बेहतर आंच देता है। यही कारण है कि नान, रोटी और लिट्टी बनाने वाले दुकानदार इसे हाथों-हाथ ले रहे हैं। सबसे ज्यादा सप्लाई शादियों के सीजन में हो रही है, जहां थोक के भाव यह कोयला खपाया जा रहा है।
बिना कागजों के 'सेफ्टी' के साथ सप्लाई
चूंकि यह पूरी तरह अवैध और अनैतिक कार्य है, इसलिए इसका कोई कागजी रिकॉर्ड नहीं रखा जाता। एजेंट पूरी सावधानी और गुप्त तरीके से माल की डिलीवरी करते हैं। एजेंटों का कहना है कि अगर ग्राहकों को पता चल जाए कि उनका खाना चिता की आग पर बना है, तो धंधा बैठ जाएगा। वर्तमान में गैस संकट के चलते एक-एक होटल संचालक 10-10 बोरियां एडवांस देकर बुक करा रहे हैं। यह मामला न केवल धार्मिक आस्थाओं के साथ खिलवाड़ है, बल्कि गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों को भी निमंत्रण दे रहा है।
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