विचारो के शुद्धिकरण का सीजन है चातुर्मास: डॉ दर्शनलता

By :  vijay
Update: 2025-07-15 11:11 GMT

आसींद (सुरेन्द्र संचेती)

चातुर्मास काल में साधु संत जिनवाणी के माध्यम से लोगों का ब्रेनवाश करते है। व्यक्ति मे जो भी बुराइयां होती है ,पाप कर्म होते है उनके बारे में उन्हें विस्तार से समझा कर उनसे होने वाले नुकसान उन्हें बताए जाते है। धर्मात्मा व्यक्ति हर परिस्थिति में अनुकूल रहता है। धर्म ही ऐसी संपति है जो यहां भी साथ देती है और आगे के भवो में भी साथ देती है। पाप से सदेव डरकर रहना चाहिए, पाप कर्म एक ना एक दिन उदय अवश्य होते ही है। उक्त विचार प्रवर्तिनी डॉ दर्शनलता ने महावीर भवन में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए।

साध्वी ऋजु लता ने धर्म सभा में कहा कि अनीति और पाप से कमाया हुआ धन अन्त में नरक की और ही लेकर जाता है। अच्छा श्रावक वो होता है जो श्रावक धर्म यानि कि न्याय और नीति से धन कमा कर अपना जीवन यापन करता हो। न्याय से कमाया हुआ धन सदेव बरकत देता है। अन्याय के धन से खरीदा गया अनाज शरीर में प्रवेश करने पर रोग उत्पन कर देता है। अन्याय और अनीति से कमाया हुआ धन व्यक्ति में क्रूरता और निर्दयता बढ़ाता है, व्यक्ति में अंहकार आ जाता है, भाषा उसकी कठोर हो जाती है, तृष्णा उसकी बढ़ जाती है, संगत उसकी गलत व्यक्तियों के साथ हो जाती है। हम स्वयं अपना आंकलन करे कि हम जो पैसा कमा रहे है वह नीति का है या अनीति का। अनीति का अन्न खाने से बहुत सी बार साधु का संयम भी विचलित हो जाता है। हम जीवन में ईमानदारी के साथ नीति और न्याय के साथ व्यापार करे ,चाहे कमाई कम हो लेकिन जो कमाई हो वह अनीति और अन्याय की नहीं हो।

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