भीलवाड़ा में शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ: माँ शैलपुत्री पूजन और घटस्थापना की धूम

Update: 2025-09-22 03:00 GMT



भीलवाड़ा,  सोमवार को आध्यात्मिक नगरी भीलवाड़ा में   शारदीय नवरात्रि का प्रथम दिन माँ शैलपुत्री की भक्ति और घटस्थापना की पवित्र रस्मों के साथ हर्षोल्लास से मनाया जा रहा हे । मंदिरों, घरों और पंडालों में सुबह से ही भक्तों की भीड़ उमड़ी, और माँ के जयकारों से वातावरण गुंजायमान हो गया। शाम को दादिया रमने को लेकर युवाओ में खासा उत्साह नजर आ रहा हे 

माँ शैलपुत्री: स्थिरता और शांति की देवी

माँ शैलपुत्री, जो नवदुर्गा का प्रथम स्वरूप हैं, पर्वतराज हिमालय की पुत्री मानी जाती हैं। पंडित विक्रम सोनी ने बताया कि माँ शैलपुत्री पर्वत के समान अडिग और दृढ़ हैं। उनकी पूजा से जीवन में स्थिरता, शांति और समृद्धि आती है। वे मूलाधार चक्र की अधिष्ठात्री हैं, जो आध्यात्मिक और शारीरिक शक्ति का प्रतीक है। पंडित जी ने कहा, "माँ की कृपा से धन-धान्य की कमी नहीं होती, और भक्तों को तपस्या व धैर्य का गुण प्राप्त होता है।"

विशेष रूप से कुंवारी कन्याओं के लिए माँ शैलपुत्री की पूजा अत्यंत फलदायी मानी जाती है। पंडित सोनी के अनुसार, शुद्ध और सात्विक भक्ति से माँ की पूजा करने वाली कन्याओं को सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है।

घटस्थापना: शक्ति के आह्वान का प्रतीक

नवरात्रि के प्रथम दिन घटस्थापना की रस्म के साथ माँ दुर्गा की शक्ति को घरों में आमंत्रित किया गया। भीलवाड़ा के मंदिरों जैसे  चावड़ा  माता मंदिर, स्थानीय पूजा स्थलों पर सुबह 6:09 से 8:06 बजे के शुभ मुहूर्त में भक्तों ने कलश स्थापना की। पंडित जी ने बताया कि कलश में गंगाजल, सुपारी, दूर्वा, अक्षत और सिक्का डालकर, आम के पत्तों और नारियल से सजाया गया। पास में जौ बोए गए, जो प्रकृति और समृद्धि का प्रतीक हैं। इस दौरान मंत्र "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" का जाप किया गया।

माँ शैलपुत्री पूजन विधि: भक्ति का सात्विक मार्ग

पंडित विक्रम सोनी ने माँ शैलपुत्री की पूजा की विधि को विस्तार से समझाया:

स्नान और पवित्रता: प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें।

कलश स्थापना: मिट्टी या तांबे का कलश स्थापित करें, जिसमें माँ दुर्गा की उपस्थिति का आह्वान हो।

मूर्ति स्थापना: माँ शैलपुत्री की मूर्ति या चित्र को लाल कपड़े पर स्थापित करें।

अर्पण: माँ को सफेद फूल, अक्षत, चंदन, कुमकुम और सफेद वस्त्र अर्पित करें।

दीप-धूप: दीप और धूप जलाकर माँ की आरती करें।

मंत्र जाप: मूल मंत्र "ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः" और वंदना मंत्र "वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम्।।" का 108 बार जाप करें।

भोग: माँ को गाय के दूध से बनी खीर (चीनी, इलायची, साबूदाना या मखाना डालकर) और सफेद मिठाई जैसे रसगुल्ला, मलाई बर्फी या मिश्री का भोग लगाएं। गाय के घी का उपयोग शुभ माना जाता है।

प्रसाद वितरण: भोग को प्रसाद के रूप में भक्तों में बांटें।

माँ को प्रिय भोग: सात्विकता का प्रतीक

पंडित सोनी ने बताया कि माँ शैलपुत्री को गाय के दूध से बनी खीर अत्यंत प्रिय है। इसमें साबूदाना, मखाना, इलायची और चीनी डालकर बनाया जाता है। इसके अलावा, सफेद मिठाई जैसे रसगुल्ला, मलाई बर्फी या मिश्री भी चढ़ाई जा सकती है। गाय के घी का उपयोग भोग में विशेष महत्व रखता है। सफेद फूल और वस्त्र माँ को अर्पित करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

माँ शैलपुत्री का महत्व: सुख-समृद्धि का आशीर्वाद

माँ शैलपुत्री की पूजा से आत्मशुद्धि, साहस और आध्यात्मिक शक्ति की प्राप्ति होती है। पंडित जी ने बताया कि माँ का स्वरूप पर्वत की तरह स्थिर और शक्तिशाली है, जो भक्तों को जीवन में दृढ़ता और धैर्य प्रदान करता है। उनकी कृपा से घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है, और धन-धान्य की कमी नहीं होती।

भीलवाड़ा में भक्ति का रंग

भीलवाड़ा के मंदिरों और घरों में सुबह से ही भक्तों ने माँ की भक्ति में लीन होकर पूजा-अर्चना की। शहर के शक्ति माता मंदिर में विशेष आरती का आयोजन किया गया, जिसमें सैकड़ों भक्तों ने हिस्सा लिया। स्थानीय बाजारों में पूजा सामग्री, सफेद मिठाई और फूलों की दुकानों पर भीड़ देखी गई। युवा और बुजुर्ग सभी माँ के दर्शन के लिए उत्साहित दिखे।

आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश

पंडित विक्रम सोनी ने कहा, "माँ शैलपुत्री की पूजा न केवल आध्यात्मिक उन्नति देती है, बल्कि सामाजिक एकता को भी बढ़ावा देती है। नवरात्रि के नौ दिन भक्ति, सात्विकता और सेवा के लिए समर्पित करें।" उन्होंने भक्तों से अपील की कि वे पर्यावरण का ध्यान रखें और प्लास्टिक का उपयोग कम करें।


 

माँ शैलपुत्री की कृपा से भीलवाड़ा सहित समस्त देशवासियों के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे। जय माता दी!

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