भवानीपुर: बंगाल की राजनीति का वह 'अभेद्य किला' जहाँ कांग्रेस के गढ़ को ढहाकर ममता बनर्जी ने रचा इतिहास
नई दिल्ली/कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में दक्षिण कोलकाता की भवानीपुर सीट महज एक निर्वाचन क्षेत्र नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन की सबसे बड़ी गवाह रही है। आज भले ही इसे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का 'राजनीतिक गढ़' माना जाता है, लेकिन इस सीट का इतिहास कांग्रेस के दबदबे और दशकों लंबे उतार-चढ़ाव से भरा रहा है।
आजादी के बाद कांग्रेस का रहा निर्विवाद राज
भवानीपुर सीट दशकों तक कांग्रेस का शहरी किला बनी रही। पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय जैसे दिग्गज नेताओं ने यहाँ से कांग्रेस के टिकट पर और बाद में निर्दलीय भी जीत दर्ज की। मीरा दत्ता गुप्ता और रथिन तालुकदार जैसे बड़े कांग्रेसी चेहरों ने इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। वामपंथी दल केवल 1969 में अल्प समय के लिए यहाँ सेंध लगा पाए थे, जब सीपीआई(एम) के साधन गुप्ता ने जीत हासिल की थी।
40 साल तक चुनावी नक्शे से गायब रही सीट
दिलचस्प तथ्य यह है कि 1972 के परिसीमन के बाद भवानीपुर सीट चुनावी मानचित्र से पूरी तरह गायब हो गई थी। लगभग 40 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद, साल 2011 में जब दोबारा परिसीमन हुआ, तब इस सीट की वापसी हुई। यह वही दौर था जब बंगाल में 34 साल पुराने वामपंथी शासन का सूरज अस्त हो रहा था और 'तृणमूल कांग्रेस' (TMC) का उदय हो रहा था।
ममता बनर्जी का अभेद्य दुर्ग बनी भवानीपुर
2011 में पुनर्गठित भवानीपुर सीट पर ममता बनर्जी के करीबी सुब्रत बख्शी ने जीत दर्ज की, जिन्होंने बाद में ममता के लिए यह सीट खाली कर दी। मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी ने यहाँ से उपचुनाव लड़ा और 77 प्रतिशत वोट हासिल कर अपनी धाक जमाई। 2016 के चुनाव में 'दीदी बनाम बौदी' (ममता बनर्जी बनाम दीपा दासमुंशी) के चर्चित मुकाबले में भी ममता ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की।
सामाजिक बनावट: मिनी इंडिया का स्वरूप
भवानीपुर की आबादी बेहद विविध है, जो इसे राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है। यहाँ 42 प्रतिशत बंगाली हिंदू, 34 प्रतिशत गैर-बंगाली (हिंदी भाषी व्यापारी समुदाय) और 24 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं। प्रसिद्ध कालीघाट मंदिर और ममता बनर्जी का निजी आवास भी इसी क्षेत्र में है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, यहाँ की मिली-जुली संस्कृति और भाषाई विविधता ही ममता बनर्जी की राजनीति को सबसे ज्यादा मजबूती प्रदान करती है।
