रतनगढ़ (ईश्वर व्यास)। महिला दिवस के अवसर पर क्षेत्र की बेटी कृष्णा महेश्वरी की प्रेरक सफलता गाथा हर किसी के लिए गर्व का विषय बनी हुई है। सीमित संसाधनों और साधारण परिवेश में पली-बढ़ी कृष्णा ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि संघर्ष सच्चा और लक्ष्य स्पष्ट हो, तो सफलता कदम चूमती है। मूलतः रतनगढ़ निवासी कृष्णा के पिता कैलाश महेश्वरी देहपुर गांव में एक छोटी सी किराने की दुकान चलाते हैं। तीन बहनों और एक भाई के साथ बड़े होते हुए कृष्णा ने बचपन से ही पारिवारिक चुनौतियों को करीब से देखा।
संघर्ष से सफलता का सफर
उच्च शिक्षा के लिए नीमच प्रवास के दौरान उन्होंने स्वावलंबन की राह चुनी। घर से 55 किलोमीटर दूर रहकर MBA की पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने नौकरी की, ताकि कमरे का किराया और पढ़ाई का खर्च स्वयं वहन कर सकें। MBA पूर्ण करने के बाद उनके पास 15 बड़े नौकरी प्रस्ताव थे, लेकिन उन्होंने महानगरों की चकाचौंध के बजाय अपने क्षेत्र के युवाओं को सशक्त बनाने का निर्णय लिया। एक छोटे से 6×8 फीट के कमरे से शुरू हुआ 'माहेश्वरी एजुकेशन सेंटर' आज डिजिटल क्रांति का केंद्र बन चुका है।
1500 से अधिक युवाओं को बनाया हुनरमंद
पिछले एक दशक में कृष्णा ने 1500 से अधिक विद्यार्थियों को डिजिटल स्किल्स और ऑनलाइन कार्यों का प्रशिक्षण दिया है। उनके मार्गदर्शन में आज 20 से अधिक युवा एमपी कियोस्क संचालित कर 40 से 50 हजार रुपये मासिक तक कमा रहे हैं। कृष्णा हर साल गर्मी की छुट्टियों में ग्रामीण बच्चों के लिए नि:शुल्क डिजिटल कक्षाएं भी चलाती हैं। आज रतनगढ़ और आसपास के 50 किलोमीटर क्षेत्र में वे 'डिजिटल दीदी' के नाम से लोकप्रिय हैं।
पिता का सपना किया साकार
कृष्णा की सफलता की सबसे भावुक कड़ी उनके पिता का हवाई यात्रा का सपना था। उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से पाई-पाई जोड़कर पिता को हवाई जहाज से तिरुपति बालाजी के दर्शन कराए। कृष्णा का जीवन संदेश देता है कि बेटियां यदि दृढ़ निश्चय कर लें, तो वे आसमान की ऊंचाइयों को छू सकती हैं। उनकी यह यात्रा महिला दिवस पर समाज के लिए एक सच्ची प्रेरणा है।