राजस्व गांव का नाम व्यक्ति या जाति के नाम पर नहीं हो सकता, सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

Update: 2025-12-23 17:15 GMT



नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी राजस्व गांव का नाम किसी व्यक्ति, धर्म, जाति या उपजाति के नाम पर नहीं रखा जा सकता। यह फैसला जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने भीकाराम सहित अन्य याचिकाकर्ताओं की अपील पर सुनवाई करते हुए सुनाया।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की अधिसूचना और हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सरकार अपनी तय नीति से हटकर कोई निर्णय नहीं ले सकती। बिना नीति में संशोधन किए किया गया कोई भी कदम मनमाना माना जाएगा, जो संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

बाड़मेर जिले से जुड़ा है मामला

यह मामला राजस्थान के बाड़मेर जिले का है, जहां राज्य सरकार ने नए राजस्व गांवों का गठन किया था। सोडा ग्राम पंचायत क्षेत्र में बनाए गए दो राजस्व गांवों के नाम निजी व्यक्तियों के नाम पर अमरगढ़ और सगतसर रखे गए थे। इन गांवों के लिए संबंधित व्यक्तियों की ओर से निजी भूमि भी उपलब्ध कराई गई थी।

राज्य सरकार ने 31 दिसंबर 2020 को इन नामों को लेकर अधिसूचना जारी की थी। इस फैसले को भीकाराम और अन्य लोगों ने हाईकोर्ट की एकलपीठ में चुनौती दी थी। एकलपीठ ने 11 जुलाई 2025 को सरकार की अधिसूचना को रद्द कर दिया था।

हालांकि इसके बाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 5 अगस्त 2025 को एकलपीठ के आदेश को पलटते हुए सरकार के फैसले को सही ठहरा दिया था। इसके खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

नीति से ऊपर नहीं हो सकती अधिसूचना

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि राज्य सरकार का 20 अगस्त 2009 का सर्कुलर साफ तौर पर कहता है कि किसी भी राजस्व गांव का नाम व्यक्ति, धर्म, जाति या उपजाति के नाम पर नहीं रखा जा सकता। जहां तक संभव हो, गांव का नाम आम सहमति से तय किया जाना चाहिए। यह सर्कुलर एक नीतिगत निर्णय है।

कोर्ट ने कहा कि कोई भी अधिसूचना नीतिगत फैसले से ऊपर नहीं हो सकती। वहीं राज्य सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि राजस्व गांवों के गठन में तय वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया और वर्ष 2009 का सर्कुलर केवल मार्गदर्शक था।

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए साफ कर दिया कि नीति का उल्लंघन कर लिया गया कोई भी निर्णय कानूनी तौर पर टिकाऊ नहीं है।

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