राजस्थान रोडवेज में कंडक्टरों की कमी, 250 पदों पर रिटायर्ड परिचालकों की दोबारा नियुक्ति का फैसला

Update: 2026-01-12 07:01 GMT

उदयपुर । राजस्थान रोडवेज में कंडक्टरों की भारी कमी के चलते विभाग ने बड़ा फैसला लिया है। प्रदेश के 34 शहरों के डिपो में खाली पड़े 250 पदों पर रिटायर्ड कंडक्टरों को फिर से सेवा में लेने की तैयारी की गई है। यह नियुक्ति सेवानिवृत परिचालक अनुबंध योजना के तहत की जाएगी।

विभाग की ओर से रिटायर्ड कंडक्टरों को हर महीने 18 हजार रुपये का निश्चित मानदेय दिया जाएगा। इसके साथ 4 हजार रुपये का अतिरिक्त बोनस पाने के लिए बस में सौ प्रतिशत सवारी अनिवार्य होगी। यदि सवारी 91 प्रतिशत से कम रही, तो बोनस नहीं दिया जाएगा। बिना सूचना के ड्यूटी से अनुपस्थित रहने पर प्रतिदिन एक हजार रुपये की पेनल्टी भी लगेगी।

रोडवेज अधिकारियों के अनुसार यह अवसर मुख्य रूप से 65 वर्ष तक की उम्र के रिटायर्ड कर्मचारियों के लिए है। इससे अधिक उम्र वाले इच्छुक लोगों को डॉक्टर से फिटनेस सर्टिफिकेट लेकर जयपुर हेड ऑफिस से अनुमति लेनी होगी। फिलहाल यह नियुक्ति एक वर्ष के लिए होगी, लेकिन काम संतोषजनक रहने पर अवधि बढ़ाई जा सकती है।

रिटायर्ड कंडक्टरों को दोबारा नौकरी के लिए अपनी जेब से 35 हजार रुपये जमा कराने होंगे। इसमें 15 हजार रुपये सुरक्षा राशि और 20 हजार रुपये टिकट मशीन के लिए देने होंगे। इसके अलावा वर्दी और नाम प्लेट का खर्च भी स्वयं उठाना होगा।

प्रदेश में सबसे ज्यादा कंडक्टरों के पद उदयपुर डिपो में खाली हैं, जहां 15 पदों पर नियुक्ति होनी है। जोधपुर, सीकर और सरदारशहर में 11-11 पद खाली हैं। जयपुर वैशालीनगर, नागौर, पाली, अलवर और चित्तौड़गढ़ में 10-10 पद रिक्त हैं। भीलवाड़ा, बीकानेर और हनुमानगढ़ में 9-9 पद, ब्यावर और श्रीगंगानगर में 8-8 पद, जबकि कई अन्य डिपो में 3 से 7 पदों तक की कमी बताई गई है।

राजस्थान रोडवेज के बेड़े में करीब 2610 बसें हैं, जिनमें 850 अनुबंधित बसें शामिल हैं। रोडवेज की बसें लगभग 1800 मार्गों पर प्रतिदिन करीब 11 लाख 60 हजार किलोमीटर का सफर तय करती हैं और रोजाना लगभग 7 लाख यात्री इनसे यात्रा करते हैं। वर्ष 2013 के बाद से रोडवेज में कोई नई भर्ती नहीं होने के कारण स्टाफ की कमी लगातार बढ़ती जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि नए कंडक्टरों की भर्ती के बजाय रिटायर्ड कर्मचारियों पर निर्भर रहना विभाग की मजबूरी को दर्शाता है। निजी बसों से कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच बुजुर्ग कंडक्टरों के लिए सौ प्रतिशत सवारी का लक्ष्य पूरा करना एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।

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