मासिक धर्म अवकाश पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: याचिका खारिज, कहा- इससे महिलाओं के रोजगार पर पड़ेगा बुरा असर

Update: 2026-03-13 09:26 GMT


नई दिल्ली/भीलवाड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की महिला छात्राओं और कामकाजी महिलाओं के लिए मासिक धर्म अवकाश (Menstrual Leave) की नीति बनाने की मांग वाली याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह के अनिवार्य अवकाश से महिलाओं के रोजगार के अवसरों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और नियोक्ता उन्हें नौकरी देने से कतरा सकते हैं।

नियोक्ताओं और सामाजिक परिणामों पर जताई चिंता

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि यह एक सकारात्मक अधिकार जैसा लग सकता है, लेकिन इसके व्यावहारिक परिणाम गंभीर हो सकते हैं। कोर्ट ने कहा, "उस नियोक्ता के बारे में सोचिए जिसे सवेतन छुट्टी (Paid Leave) देनी होगी। ऐसी स्थिति में कोई भी उन्हें नौकरी नहीं देना चाहेगा।"

'हीण भावना और रूढ़िवादिता को मिल सकता है बढ़ावा'

पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की याचिकाएं अनजाने में महिलाओं के प्रति समाज में बनी रूढ़िवादी सोच को और मजबूत कर सकती हैं। अदालत के अनुसार, ऐसी मांगें यह जताने की कोशिश करती हैं कि मासिक धर्म कोई 'बुरी चीज' है, जो महिलाओं को हीन दिखा सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विभाग से जुड़े प्राधिकारी इस पर विचार कर सकते हैं और सभी हितधारकों से परामर्श के बाद ही कोई नीति बनाने की संभावना तलाशी जानी चाहिए।

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