चुनाव से बच रही सरकार? 113 निकायों का भविष्य अधर में, अब सुप्रीम कोर्ट की शरण!
जयपुर। प्रदेश में लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई यानी नगरीय निकायों के चुनाव को लेकर राज्य सरकार की नीयत पर अब सवालिया निशान खड़े होने लगे हैं। हाईकोर्ट के कड़े आदेशों के बावजूद सरकार चुनाव कराने के बजाय समय की 'जुगाड़' में जुट गई है। 113 निकायों का चुनाव टलवाने के लिए सरकार ने अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, जिसे विपक्ष और आम जनता सरकार की चुनावी घबराहट के रूप में देख रही है।
परिसीमन का बहाना या कानूनी पेच?
सरकार का तर्क है कि हाईकोर्ट ने 113 निकायों का परिसीमन रद्द कर दिया है, इसलिए उन्हें नई प्रक्रिया के लिए समय चाहिए। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब वार्डों की संख्या बदली ही नहीं गई, तो केवल 'आंतरिक सीमाओं' के फेरबदल में ऐसी क्या उलझन है कि चुनाव ही टालने पड़ रहे हैं? जानकारों का मानना है कि परिसीमन का यह विवाद सरकार के लिए चुनाव टालने का एक सुरक्षित 'हथियार' बन गया है।
15 अप्रैल की डेडलाइन पर 'वार'
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट, दोनों ही पहले स्पष्ट कर चुके हैं कि 15 अप्रैल तक पंचायत और निकाय चुनाव हर हाल में संपन्न होने चाहिए। कोर्ट ने 31 दिसंबर तक परिसीमन प्रक्रिया पूरी करने की मोहलत भी दी थी। अब ऐन वक्त पर सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर करना यह संकेत देता है कि सरकार फिलहाल जनता के बीच जाने के मूड में नहीं है। क्या यह देरी अपनी कमियों को छिपाने की कोशिश है या वाकई प्रशासनिक मजबूरी? इसका फैसला अब देश की सबसे बड़ी अदालत करेगी।
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