राजस्थान में नशे का गहराता जाल – रगों में घुलता 'सफेद जहर' और बेखौफ सौदागर
राजस्थान: प्रदेश के शांत शहरों और गांवों की आबो-हवा में अब नशे की कड़वाहट घुलने लगी है। एक विस्तृत पड़ताल में यह डरावना सच सामने आया है कि नशा अब केवल बड़े तस्करों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह आपके घर के पास वाली गली, बच्चों के स्कूल और युवाओं के हैंगआउट पॉइंट्स तक पहुँच चुका है।
राजस्थान और गुजरात की सीमाओं पर 'मौत की पुड़िया' का यह कारोबार अब एक संगठित उद्योग का रूप ले चुका है, जहाँ कानून का खौफ खत्म होता नजर आ रहा है।
1. संगठित नेटवर्क: महिलाएं और बच्चे बने 'कवच'
नशे के इस काले कारोबार में अब अपराधियों ने अपना तरीका बदल लिया है। पुलिस और जांच एजेंसियों से बचने के लिए महिलाओं और छोटे बच्चों को 'पैडलर' (नशा पहुँचाने वाला) बनाया जा रहा है।
पैडलर बच्चे: स्कूल जाने की उम्र वाले बच्चे महज कुछ रुपयों के लालच में ग्राहकों को नशे की पुड़िया थमा रहे हैं।
महिलाएं: कई इलाकों में महिलाएं न केवल नशा बेच रही हैं, बल्कि पूरी की पूरी गैंग का संचालन कर रही हैं।
2. 50 रुपये में 'गांजा', हर नुक्कड़ पर 'स्मैक'
नशे की उपलब्धता इतनी आसान हो गई है कि एक कोल्ड ड्रिंक से भी कम कीमत यानी 50 से 100 रुपये में गांजे की पुड़िया मिल रही है। स्मैक और एमडी (MD) जैसे घातक ड्रग्स अब केवल हाई-प्रोफाइल पार्टियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि झुग्गी-झोपड़ियों और मध्यमवर्गीय मोहल्लों में धड़ल्ले से बिक रहे हैं।
3. खेतों में उग रही 'केमिकल मौत' (MD फैक्ट्रियां)
सबसे चौंकाने वाला खुलासा औद्योगिक क्षेत्रों और सुनसान खेतों को लेकर हुआ है। यहाँ केमिकल और खाद बनाने की आड़ में सिंथेटिक ड्रग्स (MD) तैयार करने वाली मिनी फैक्ट्रियां चल रही हैं। हाल ही में प्रतापगढ़ और अन्य जिलों में हुई पुलिसिया कार्रवाई इस बात का प्रमाण है कि तस्कर अब नशे का आयात करने के बजाय उसे यहीं 'मैन्युफैक्चर' कर रहे हैं।
4. युवाओं का बर्बाद होता भविष्य
इस नेटवर्क की सबसे बड़ी मार प्रदेश के युवाओं पर पड़ रही है। बेरोजगारी और अवसाद के चलते युवा इस जाल में आसानी से फंस रहे हैं। सर्वे में सामने आया है कि राजस्थान के कई मोहल्लों में ऐसी 'अघोषित दुकानें' चल रही हैं जहाँ शाम होते ही नशेड़ियों का जमावड़ा लग जाता है।
5. सिस्टम पर सवाल: कहाँ है पुलिस का खौफ?
जब 25 रिपोर्टर्स की टीम ग्राउंड जीरो पर उतरी, तो पाया कि नशा बेचने वाले पॉइंट्स फिक्स हैं, लेकिन पुलिस की कार्रवाई केवल 'छोटी मछलियों' तक सीमित रहती है। बड़े मगरमच्छ और सिंडिकेट अब भी सलाखों के पीछे पहुँचने से दूर हैं।
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