प्रदूषण का कहर: बिना जिग-जैग तकनीक चल रहे ईंट-भट्टों पर होगी कार्रवाई, प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने कसी कमर
ईंट-भट्टों से निकलने वाला धुआं प्रदेश की आबोहवा को लगातार खराब कर रहा है जिससे वायु प्रदूषण का स्तर खतरनाक होता जा रहा है। बार-बार समय सीमा बढ़ाने के बावजूद कई ईंट-भट्टों ने अब तक जिग-जैग तकनीक नहीं अपनाई है। अब राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने सख्ती बरतते हुए ऐसे भट्टों पर सीधी कार्रवाई करने की तैयारी कर ली है जो बिना आधुनिक तकनीक के संचालित पाए जाएंगे। नियमों के अनुसार नगर निगम सीमा से 10 किलोमीटर के दायरे में आने वाले सभी ईंट-भट्टों को जून 2024 तक जिग-जैग तकनीक अपनानी अनिवार्य थी। अब यदि इन भट्टों पर पुरानी पद्धति से ईंट तैयार होती मिली तो मंडल द्वारा कानूनी कार्रवाई की जाएगी। वहीं निगम सीमा से 10 किलोमीटर से अधिक दूरी पर स्थित भट्टों के लिए 30 जून तक की समय सीमा तय की गई है। भीलवाड़ा जिले में चल रहे अधिकांश ईंट-भट्टों ने अब तक इस तकनीक को नहीं अपनाया है जिससे उन पर भी गाज गिरना तय है। गौरतलब है कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने फरवरी 2022 में पहली बार नोटिफिकेशन जारी कर एक साल के भीतर तकनीक बदलने के निर्देश दिए थे। इसके बाद दिसंबर 2023 में दूसरा नोटिफिकेशन जारी कर समय सीमा को बढ़ाया गया था। बार-बार मोहलत मिलने के बाद भी प्रदेश के करीब 25 फीसदी भट्टों ने अब तक निर्देशों का पालन नहीं किया है जिसके चलते अब प्रदूषण मंडल ने छापेमारी और जुर्माने की रणनीति बनाई है।22 जनवरी 2025 : मंत्रालय ने तीसरा नोटिफिकेशन जारी कर निगम सीमा से 10 किलोमीटर बाहर के भट्टों को जून 2026 तक का समय दिया।
जिग-जैग तकनीक
जिग-जैग तकनीक में ईंट-भट्टे की चिमनी की ऊंचाई 27 मीटर होती है। इससे ईंधन की खपत कम होती है और वायु प्रदूषण भी घटता है। साथ ही ईंटों की गुणवत्ता बेहतर होती है।
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