पश्चिम बंगाल चुनावी शंखनाद: बंगाली अस्मिता, 'वोटर लिस्ट' का खेल और शहरी असंतोष ने बढ़ाई सियासी तपिश
कोलकाता/नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज होने के लिए बिछने वाली चुनावी बिसात इस बार केवल वादों और नारों तक सीमित नहीं रहने वाली है। राज्य की सियासी हवा में इस समय बंगाली अस्मिता, मतदाता सूची से लाखों नामों का गायब होना और शहरी आबादी के बीच पनपता गहरा असंतोष जैसे मुद्दे घुले हुए हैं, जो किसी भी समय बड़ा उलटफेर कर सकते हैं।
ममता की 'अस्मिता' बनाम भाजपा का 'भ्रष्टाचार' अस्त्र
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक बार फिर 'बाहरी बनाम भीतरी' के अपने आजमाए हुए फॉर्मूले के साथ ‘बंगाली पहचान’ की ढाल तैयार कर रही हैं। तृणमूल कांग्रेस ‘बंगाली उप-राष्ट्रवाद’ को हवा देकर भाजपा को घेरने की रणनीति पर काम कर रही है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) घुसपैठ, भ्रष्टाचार और स्कूल भर्ती घोटाले जैसे मुद्दों को हथियार बनाकर टीएमसी के किले में सेंध लगाने की फिराक में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मालदा की रैली में अवैध घुसपैठ और 'सिंडिकेट राज' का मुद्दा उठाकर स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा के लिए ध्रुवीकरण और सुरक्षा प्रमुख चुनावी धाराएं होंगी।
वोटर लिस्ट में 'महा-बदलाव': 63 लाख से अधिक नाम कटे
बंगाल चुनाव से ठीक पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) ने राज्य में एक अभूतपूर्व स्थिति पैदा कर दी है।
हटाए गए नाम: आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, मतदाता सूची से लगभग 63.66 लाख नाम हटा दिए गए हैं।
कुल मतदाता: मतदाताओं की कुल संख्या 7.66 करोड़ से घटकर करीब 7.04 करोड़ रह गई है।
विचाराधीन: करीब 60.06 लाख और नाम अभी विचाराधीन हैं।
इस बदलाव ने विशेष रूप से मतुआ समुदाय और प्रवासियों के बीच नागरिकता और पहचान को लेकर डर पैदा कर दिया है, जो करीब 50 विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
शहरी असंतोष और ‘रिक्लेम द नाइट’ का असर
आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना के बाद उपजा ‘रिक्लेम द नाइट’ आंदोलन बंगाल के शहरी इलाकों में तृणमूल सरकार के खिलाफ एक बड़ा सामाजिक प्रतिरोध बनकर उभरा है। महिलाओं और युवाओं के बीच सुरक्षा को लेकर उपजा यह आक्रोश चुनाव के दौरान एक मजबूत सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) में बदल सकता है। विपक्ष इसे 'संस्थानों पर टीएमसी का नियंत्रण' और 'कानून व्यवस्था की विफलता' के रूप में पेश कर रहा है।
आर्थिक और जनसांख्यिकीय मुद्दे
भाजपा राज्य को ‘उद्योगों का कब्रिस्तान’ करार देते हुए रोजगार के अभाव और ‘मजदूर निर्यात अर्थव्यवस्था’ जैसे मुद्दों को उठा रही है। स्कूल भर्ती घोटाले में 25,000 नियुक्तियों का रद्द होना भी सरकार के लिए गले की हड्डी बना हुआ है। अब देखना यह होगा कि बंगाल की जनता 'अस्मिता' के नैरेटिव पर मुहर लगाती है या 'परिवर्तन' की लहर को चुनती है।
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