उत्पादन नहीं रोककर उपयोगकर्ता से छीना-झपटी करना अन्याय- राष्ट्रसंत कमलमुनि

Update: 2026-03-03 16:10 GMT

 आकोला( रमेश चंद्र डाड)मांडलगढ़ क्षेत्र की समाजसेविका एवं जैन दिवाकर विचार मंच रजिस्टर्ड नई दिल्ली के राष्ट्रीय मंत्री मधु संचेती ने बताया कि कांचीपुरम में विराजित कमलमुनि जी महाराज कमलेश ने कहा है कि सरकारें आती है, वह अपने नियम व कानून बनाकर कार्य करती है। हर सरकार अच्छे शासन के साथ जनता की सेवाएँ करने के भरसक प्रयास करती है तथापि कुछ नियमों की आड़ में शासन-तन्त्र कुछ कार्यवाहियों में ऐसी कार्यशैली अपनाने लगता है, जो जनमानस पस पर सीधे चोट करने लगता है एवं वही कार्यवाहियों तरकार की लोकप्रियता व जन विश्वास को खण्ड-खण्ड करने लगती है, यदि ऐसा होने लगे तो सरकार को अपने काम-काजों की निश्चित ही समीक्षा करनी चाहिए। उक्त विचार देश के अनेकों प्रदेशों के राजकीय अतिथि एवं जैन धर्म संघ के कई प्रमुख संगठनों के पदाधिकारी राष्ट्रसंत कमलमुनि जी म. 'कमलेश' ने व्यक्त किए। उदाहरणार्थ उन्होंने प्रश्न उठाया कि देश विशेषतः कई प्रदेशों में सरकार प्लास्टिक के विरुद्ध अभियान चलाकर उन छोटे-छोटे व्यवसायियों, ठेले खोमचे, होटलों वालों, फल-सब्जी विक्रेताओं से प्लास्टिक जब्ती एवं सरकारी शक्ति का जिस ढंग से प्रदर्शन कर रही है, क्या यह ठीक है? इस मामले में होना तो यह चाहिए कि प्रतिबन्धित प्लास्टिक का उत्पादन ही न हो। उत्पादन ही नहीं होगा तो फिर उपयोग कैसे होगा। प्रतिबन्ध उपयोगकर्ता पर नहीं, उत्पादनकर्ता पर होना चाहिए। प्रतिबन्धित वस्तुओं का उत्पादन कहाँ हो रहा है? क्यों हो रहा है? क्यों होने दिया जा रहा है? यह विचारणीय प्रश्न होने चाहिए। यदि मिठाई पर प्रतिबन्ध हो तो मिठाई नहीं बनने देनी चाहिए, बनने के बाद खाने वाले को मारना कितना उचित है? यदि प्लास्टिक के उत्पादन को नहीं रोका जा रहा है तो प्रयोगकर्ता को क्यों परेशान किया जा रहा है? उपयोगकर्ता से छीना-झपटी, जब्ती, छापेमार कार्यवाही एवं चालान बनाकर उसे क्यों परेशान किया जा रहा है? यदि सरकार की मंशा ऐसी नहीं है तो क्या लोकसेवक ऐसी कार्यवाहियों को अंजाम दे रहे हैं, जिससे शासन के प्रति लोगों की नाराजगी बढ़ रही है? यदि ऐसा हो तो सरकार को निश्चित ही अपने काम-काज की समीक्षा करनी चाहिए।

राष्ट्रसंत ने कहाकि प्लास्टिक ही नहीं और भी कई ऐसी वस्तुओं पर प्रतिबन्ध हो सकता है, ऐसे मामलों में सबसे पहले उत्पादनकर्ता को पकड़‌ना चाहिए, उत्पादन पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए, ताकि वे वस्तुएँ बाजार में आ ही नहीं पाये। उन्होंने कहाकि बांस ही नहीं रहेगा तो बांसुरी कैसे बजेगी । सरकार फेक्ट्रियों पर प्रतिबन्ध न लगाकर प्रतिस्पर्धी युग में बड़ी मुश्किल से कारोबार चला रहे लोगों को छापेमार कार्यवाही से भयभीत करे, रोब झाड़े, परेशान करे, छोटे-छोटे लोगों से चालान काटकर सरकारी खजाना भरे, यह उनका पेट काटने जैसी कार्यवाही है, जो किसी लोकप्रिय शासन की निशानी नहीं हो सकती।

राष्ट्रसंत ने यह भी स्पष्ट किया कि एक ओर सरकारें छोटे उद्यमियों, कामगारों, मेहनतकश लोगों के हमदर्द होने की दुहाई देती है तथा उन्हीं के द्वारा नियुक्त लोकसेवकों की निरंकुश कार्यवाहियों पर ध्यान ही न हो तो आखिर उसका खामियाजा तो सरकार को भुगतना ही पड़ता है साथ ही आम लोगों के मन मस्तिष्क पर सरकार के प्रति विकृत छवि का निर्माण होता है हर चीज में कानून व नियम का भय नहीं बनना चाहिए ,कार्यवाहियां ऐसी होनी चाहिए जो आम लोगों के लिए परेशानी का सबब नहीं बने,

राष्ट्रसंत सरकार के कामकाज व लोक व्यवहार विषय पर प्रवचन दे रहे थे। उन्होंने कई ज्वलंत मु‌द्दों पर सटीक उ‌द्बोधन देते हुए जनप्रतिनिधियों के लिए भी संदेश दिया कि वह ऐसी कार्यवाहियों पर रोक लगाने एवं सरकार का ध्यान आकृष्ट करने में महत्ति भूमिका का निर्वहन करे जो छोटे कमजोर व गरीब लोगों के साथ खिलवाड़ भरे हो।

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