भारत यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता तय, कपड़ा और जूते से लेकर कार व वाइन तक शुल्क कटौती संभव
नई दिल्ली। भारत और 27 देशों के समूह यूरोपीय संघ के बीच लंबे समय से चल रही मुक्त व्यापार समझौते की बातचीत आखिरकार पूरी हो गई है। इस समझौते के तहत कपड़ा, चमड़ा, जूते चप्पल जैसे श्रम प्रधान क्षेत्रों के साथ साथ कारों और वाइन पर आयात शुल्क में कटौती की संभावना जताई जा रही है। दोनों पक्ष 27 जनवरी को औपचारिक रूप से इस समझौते के संपन्न होने की घोषणा करेंगे।
वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने बताया कि करीब दो दशक चली वार्ताओं के बाद भारत और यूरोपीय संघ एक व्यापक एफटीए पर सहमत हो गए हैं। उन्होंने कहा कि यह करार भारत के दृष्टिकोण से संतुलित है और इससे यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था के साथ देश का जुड़ाव और मजबूत होगा। साथ ही दो तरफा व्यापार में बड़ा इजाफा होने, निवेश बढ़ने और आर्थिक सहयोग गहराने की उम्मीद है।
समझौते में कई सेवा क्षेत्रों के नियमों को आसान किए जाने की भी संभावना है। यह बातचीत वर्ष 2007 में शुरू हुई थी और 18 साल बाद अब इसे अंतिम रूप मिला है। भारत ने विशेष रूप से कपड़ा, परिधान, रत्न आभूषण और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों के लिए यूरोपीय बाजार में शून्य शुल्क पहुंच की मांग रखी थी।
ऑटोमोबाइल क्षेत्र के लिए कोटा आधारित रियायतें
यूरोपीय संघ की ओर से कारों और वाइन सहित मादक पेय पदार्थों पर शुल्क घटाने की मांग की गई है। इससे पहले भारत ब्रिटेन, संयुक्त अरब अमीरात और ऑस्ट्रेलिया के साथ हुए समझौतों में भी इसी तरह की रियायतें दे चुका है। ब्रिटेन के साथ ऑटोमोबाइल क्षेत्र में कोटा आधारित व्यवस्था अपनाई गई थी जबकि ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ वाइन को समझौते में शामिल किया गया था।
भारत ने ऑस्ट्रेलियाई वाइन पर दस वर्षों में चरणबद्ध तरीके से शुल्क कम करने की सहमति दी है। वाणिज्य मंत्रालय का मानना है कि यूरोपीय संघ के साथ यह समझौता घरेलू ऑटो उद्योग के लिए निर्यात बढ़ाने और यूरोपीय कंपनियों के साथ नई साझेदारियों के अवसर खोलेगा।
डेरी और कृषि क्षेत्र बाहर रखे गए
वर्तमान में यूरोपीय संघ में भारतीय उत्पादों पर औसतन 3.8 प्रतिशत शुल्क लगता है, जबकि श्रम प्रधान क्षेत्रों पर यह करीब 10 प्रतिशत तक है। दूसरी ओर यूरोपीय संघ के सामानों पर भारत का औसत आयात शुल्क 9.3 प्रतिशत है, जिसमें ऑटोमोबाइल और रसायनों पर ऊंची दरें शामिल हैं। भारत मादक पेय पदार्थों पर 100 से 125 प्रतिशत तक शुल्क लगाता है।
इस समझौते में संवेदनशील कृषि मुद्दों को शामिल नहीं किया गया है। यूरोपीय संघ जहां अपने बीफ, चीनी और चावल बाजार को लेकर सतर्क रहा है, वहीं भारत ने छोटे किसानों की आजीविका को बचाने के लिए डेरी और कृषि क्षेत्रों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा से बाहर रखने का रुख अपनाया है।
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