दुर्गा सप्तशती का पाठ, सभी तरह की समस्याओं से मिलेगा निजात

Update: 2025-03-30 05:42 GMT
दुर्गा सप्तशती का पाठ, सभी तरह की समस्याओं से मिलेगा निजात
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नवरात्रि मां दुर्गा का आशीर्वाद पाने का अवसर है, जो साल में चार बार आती है। इन सभी में दो गुप्त नवरात्रि है, जो माघ और आषाढ़ मास में पड़ती है। इसे मुख्य रूप से तंत्र साधना के लिए जाना जाता है, जबकि चैत्र और शारदीय नवरात्रि देवी की विशेष कृपा पाने का मौका है। इस दौरान मां दुर्गा की विधि-विधान से पूजा करने पर भक्तों के सभी तरह के संकटों का निवारण व कार्यों में आ रही बाधाएं समाप्त होती हैं।

वर्तमान में चैत्र माह जारी है और इस माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नवरात्रि प्रारंभ होती है, जिसका समापन नवमी तिथि पर किया जाता है। इस बार 30 मार्च 2025 से चैत्र नवरात्रि है और 6 अप्रैल 2025 को रामनवमी के दिन इसका समापन किया जाएगा। इस शुभ अवधि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा का विधान है। यदि सच्चे प्रेम भाव से इस समय देवी दुर्गा की उपासना और उपवास किया जाए, तो मां भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। इस दौरान 'दुर्गा सप्तशती' का पाठ करना और भी कल्याणकारी है। इसके प्रभाव से व्यक्ति को सुख-शांति, रोगों से मुक्ति, करियर में तरक्की व व्यापार में लाभ की प्राप्ति होती हैं। ऐसे में आइए इस शक्तिशाली पाठ के बारे में जानते है...


दुर्गा सप्तशती पाठ में 13 अध्याय

चैत्र नवरात्रि की पूजा में दुर्गा सप्तशती का पाठ करना बेहद शुभ और कल्याणकारी माना जाता है। इस पाठ में 13 अध्याय है, जिसमें 700 श्लोक हैं। कहा जाता है कि दुर्गा सप्तशती पाठ के इन 13 अध्यायों में मां दुर्गा के तीन चरित्रों के बारे में बताया गया है। यदि आप इसका पूरा पाठ नहीं कर पाते हैं, तो केवल इन 7 श्लोकों का पाठ करने से देवी की कृपा और डर भय से मुक्ति पा सकते हैं...

ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।

बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।।

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेष जन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।

दारिद्र्य दुःख भयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकार करणाय सदार्द्रचित्ता।।

सर्वमङ्गल माङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।

शरण्ये त्र्यंम्बके गौरि नारायणि नमोस्तु ते॥

शरणागत दीनार्तपरित्राण परायणे

सर्वस्यार्ति हरे देवि नारायणि नमोस्तु ते॥4॥

सर्वस्वरुपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते।

भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोस्तु ते॥

रोगानशेषानपंहसि तुष्टारुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।

त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता हि आश्रयतां प्रयान्ति॥

सर्वबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।

एवमेव त्वया कार्यम् अस्मद् वैरि विनाशनम्॥

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