चित्तौड़गढ़ । प्राज्ञ संघ के संघनायक प्रियदर्षनमुनिजी म.सा. ने गुरूवार को षांतिभवन में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहाकि मंगल करना ही जिसका स्वभाव हो वो मंगल है। हम लापसी, गुड़ आदि को मंगल मान लेते है, लेकिन आगम वाणी के अनुसार तुम जिसे मंगल मान रहे हो वो मंगल कर दे, इसकी गारंटी नही है। आपने बीमा कराया उसमे सूत्र है ‘‘जीवन के साथ भी और जीवन के बाद भी’’ यह जीवन के साथ है, यह जो समझ मे आता है किन्तु जीवन के बाद वाला सूत्र समझ में नहीं आता। क्योकि मरने के बाद तो धन परिवार वालों को मिलेगा। आपके काम तो नही आयेगा। मगर यह धर्म गारंटी लेता है कि मै इस भव, परभव, भवाभवो में तुम्हारा साथ दूंगा।
आपने कहाकि विजयनगर के पास एक पंडितजी को देखा, उन्होने अपनी बेटियों का मुहूर्त देखकर विवाह किया, लेकिन आष्चर्य की बात है कि उनकी सातो ही बेटिया उनके सामने ही विधवा हो गई। ऐसी अनेक घटनाएं देखकर हमको चिन्तन करना चाहिए, वास्तविक मंगल क्या है। बाहरी मंगल अमंगल भी हो सकते है, मगर यह चार मंगल कभी भी अमंगल नही हो सकते, क्योकि यह चारो मंगल किसी साधारण व्यक्ति के द्वारा दिये हुए नहीं है। यह चारो ही मंगल सर्वज्ञ, सर्वदर्षी भगवान द्वारा दिये गये है। उन्होने स्वयं अपने उपर प्रयोग करके फिर यह अनुभवपरक षरण को हमे दिया है।
आपने षरण की विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा है कि पहली षरण अरिहंत की जिन्होने राग-द्वेश को समाप्त कर दिया। सिद्ध कौन ? जिनका अब कार्य करना षेश नही रहा है। कर्मो को अपनी आत्मा से मुक्त करने का कार्य उन्होने कर लिया।
आपने कहाकि दुकान पर बैठकर जब गांधीजी हाथ में आ जाए तब राजी होते या माला के आ जाने पर। सोचना जब माला हाथ में आये और मन हर्शित हो जाए तो मानना कि मैं सही ट्रेक पर चल रहा हूं। प्रष्न उठता है कि आज तो अरिहंत और सिद्ध मौजूद नही, तब किनकी षरण में जाए? भगवान ने तब ‘साहू षरण पवज्जामि’। साधु की षरण में जाने का निर्देष दिया है। ‘साहनोति स्व-पर कार्याणि इति साधु।’ जो स्व औरपर कल्याण के मार्ग पर चलता है, वही वास्तव में साधु है। जो लोभ को बढाये राग और द्वेश पनपाये, अपने को सुपर और दूसरे को नीचे बताये। वह कभी साधु हो ही नही सकता।
आपने कहाकि केवली प्ररूपित धर्म को स्वीकार करना चाहिए। यह भगवान के धर्म का राजमार्ग है और हमें मंजिल की ओर ले जाने वाला है।
इससे पूर्व सौम्यदर्षनमुनिजी म.सा. ने कहा कि आज तो लोगो ने धर्म को स्वार्थ से जोड़ दिया है। आज प्रभावना बांटनी षुरू कर दी, ताकि भीड़ बढ़ जायेगी। सोहनगुरू फरमाते थे कि जिसमें स्वयं की प्रभावना सामथ्र्य नही हो वो ही प्रभावना का सहारा लेता है।
कार्यक्रम का संचालन विमलकुमार कोठारी ने किया। शुक्रवार का प्रवचन भी शांतिभवन में आयोजित होगा।
