राजस्थान की जेलों में बंदियों के अधिकारों पर हाईकोर्ट सख्त, जारी किए महत्वपूर्ण निर्देश
जयपुर। मानव गरिमा और सम्मानजनक जीवन का अधिकार भारतीय संविधान का मूल सिद्धांत है, जो हर नागरिक पर समान रूप से लागू होता है, चाहे वह जेल में बंद कैदी ही क्यों न हो। आज़ादी के 79 वर्षों बाद भी न्याय व्यवस्था का उद्देश्य दंड से अधिक सुधार पर आधारित माना जाता है, ताकि बंदियों में आत्मसम्मान की भावना विकसित हो और वे समाज की मुख्यधारा में पुनः लौट सकें।
इसके बावजूद राजस्थान की जेलों में बंदियों को आज भी कई बुनियादी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। विशेष रूप से पीने और स्नान के लिए पर्याप्त पानी की कमी जैसी गंभीर परिस्थितियां सामने आई हैं। इन्हीं मुद्दों को लेकर राजस्थान उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य सरकार और न्यायिक अधिकारियों को अहम निर्देश जारी किए हैं।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि सेशन जज, मुख्य महानगर या न्यायिक मजिस्ट्रेट तथा जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव समय-समय पर जेलों का अचानक निरीक्षण करेंगे। इस दौरान वे बंदियों से सीधे संवाद कर उनकी समस्याओं को जानेंगे और अपनी रिपोर्ट संबंधित प्राधिकरणों को सौंपेंगे।
इसके साथ ही राज्य सरकार को प्रत्येक जिले में शिकायत निवारण समिति गठित करने के निर्देश दिए गए हैं। इस समिति में जिला कलेक्टर, जिला जज, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, समाज कल्याण अधिकारी और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव को शामिल किया जाएगा। यह समिति जेलों में बंदियों की सभी प्रकार की शिकायतों का निस्तारण करेगी।
न्यायालय ने यह भी आदेश दिया है कि प्रत्येक जेल परिसर में सूचना बोर्ड लगाए जाएं, जिनके माध्यम से बंदियों को यह जानकारी दी जाए कि वे अपनी समस्याएं और शिकायतें किस प्रकार समिति के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं।
इसके अलावा हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को पीने के पानी, स्नान के पानी, स्वच्छता और स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़े स्पष्ट मानक और नीतियां तैयार करने तथा उनका सख्ती से पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
न्यायमूर्ति अनूप कुमार ढंढ द्वारा दिए गए ये निर्देश जेल व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे आदेश न केवल बंदियों के संविधान प्रदत्त अधिकारों की रक्षा करेंगे, बल्कि जेल प्रणाली को अधिक मानवीय और सुधारात्मक बनाने में भी सहायक सिद्ध होंगे।
