भगवान महावीर स्वामी जन्मोत्सव: अहिंसा, सत्य और करुणा का संदेश

By :  vijay
Update: 2026-03-30 13:40 GMT

 उदयपुर। वर्तमान अवसर्पिणी काल की चौबीसी के अंतिम तीर्थंकर, श्रमण भगवान महावीर स्वामी की जन्मजयंती के अवसर पर उनके त्याग और तपस्या से ओत-प्रोत जीवन पर एक विशेष आलेख प्रस्तुत है।

भगवान महावीर का जन्म आज से लगभग 2625 वर्ष पूर्व बिहार के क्षत्रियकुंड (कुंडग्राम) में चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को हुआ था। राजा सिद्धार्थ और माता त्रिशला के आंगन में जन्मे बालक का नाम 'वर्धमान' रखा गया। उनके बड़े भाई नंदीवर्धन और बहन सुदर्शना थी। सिंह के प्रतीक और स्वर्ण वर्ण वाले प्रभु ने समाज में व्याप्त हिंसा, पशुबलि और भेदभाव को मिटाकर सत्य व अहिंसा का मार्ग प्रशस्त किया।

पंच कल्याणक और मेरु पर्वत पर जन्माभिषेक

भगवान के जीवन में च्यवन, जन्म, दीक्षा और निर्वाण कल्याणक का विशेष महत्व है। मान्यताओं के अनुसार, उनके जन्म के समय इंद्रों ने मेरु पर्वत पर ले जाकर स्वर्ण व रत्न जड़ित कलशों से प्रभु का जन्माभिषेक किया था। 30 वर्ष की आयु तक गृहस्थाश्रम में रहने के बाद, उन्होंने 3 अरब 88 करोड़ से अधिक स्वर्ण मुद्राओं का दान कर दीक्षा ग्रहण की।

कठोर तप और केवलज्ञान

महावीर स्वामी ने 12 वर्ष, 6 माह और 15 दिन की कठिन साधना की। इस लंबी अवधि में उन्होंने अधिकांश समय निर्जल उपवास किया और मात्र 350-353 दिन ही पारणा (भोजन) किया। निरंतर मौन और ध्यान के बल पर उन्हें 'केवलज्ञान' प्राप्त हुआ, जिसके बाद उन्होंने दुनिया को पंचशील सिद्धांत— अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य और ब्रह्मचर्य का संदेश दिया।

जीवित महावीर स्वामी: एक दुर्लभ प्रतिमा

बिहार के क्षत्रियकुंड में भगवान महावीर की सबसे प्राचीन (लगभग 2550 वर्ष पुरानी) प्रतिमा विराजमान है, जिसे 'जीवित स्वामी' कहा जाता है। कसौटी पत्थर से बनी इस प्रतिमा को उनके बड़े भाई नंदीवर्धन ने प्रभु के जीवनकाल में ही बनवाया था। इस प्रतिमा पर उनके परिवार के सदस्यों की सुंदर नक्काशी भी उकेरी गई है। भगवान ने 72 वर्ष की आयु में पावापुरी में निर्वाण प्राप्त किया।

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