गौवंश के ग्रीष्म ऋतु एवं लू-प्रकोप से बचाव के लिए परामर्श
भीलवाड़ा | गर्मी के मौसम में बढ़ते तापमान और गर्म हवाओं (लू) के थपेड़ों से गौवंश को बचाना अत्यंत आवश्यक है। बाहरी वातावरण का तापमान अधिक होने पर पशुओं को 'हीट स्ट्रोक' या 'सन स्ट्रोक' का खतरा बढ़ जाता है। पशुपालन विशेषज्ञों ने गौवंश की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
गौवंश में लू (हीट स्ट्रोक) के मुख्य लक्षण:
पशु को तीव्र ज्वर (बुखार) होना।
मुँह खोलकर जोर-जोर से सांस लेना या हांफना।
मुँह से अत्यधिक लार गिरना और बेचैनी होना।
भूख में कमी आना और बार-बार पानी पीना।
पेशाब का कम होना या पूरी तरह बंद हो जाना।
पशु की कार्यक्षमता में गिरावट और धड़कन का तेज होना।
कभी-कभी आफरें (पेट फूलने) की शिकायत होना।
बचाव के प्रभावी उपाय:
छायादार स्थान: गौवंश को सूर्य की सीधी किरणों से बचाएं। उन्हें हवादार छप्पर या घने छायादार वृक्षों के नीचे रखें।
ठंडक का प्रबंध: गौशाला को ठंडा रखने के लिए दीवारों पर जूट की टाट लटकाकर उन पर पानी छिड़कें। संभव हो तो पंखे या कूलर का उपयोग करें।
स्वच्छ जल और आहार: दिन में कम से कम चार बार स्वच्छ और ठंडा पानी पिलाएं। संतुलित आहार के साथ उचित मात्रा में खनिज मिश्रण दें। चराई के लिए सुबह जल्दी या शाम को देर से भेजें। आहार में जौ, गेहूं का चोकर और एजौला घास शामिल करें।
उपचार और देखभाल:
पशु को सुबह या शाम के समय ठंडे पानी से नहलाएं।
शरीर में लवणों की कमी पूरी करने के लिए 'इलेक्ट्रोलाइट थेरेपी' दी जानी चाहिए।
यदि पशु चारा खाना बंद कर दे या सुस्त दिखे, तो बिना देरी किए निकटतम पशु चिकित्सालय से संपर्क करें।
ग्याभन (गर्भवती) एवं असहाय गौवंश की विशेष देखभाल सुनिश्चित की जाए।
जागरूकता और स्वच्छता:
समाज में गौवंश सुरक्षा के प्रति जागरूकता फैलाना आवश्यक है। दुर्भाग्यवश यदि किसी गौवंश की मृत्यु हो जाए, तो संक्रमण रोकने के लिए शव का निस्तारण शीघ्र और सम्मानजनक ढंग से किया जाना चाहिए ताकि गर्मी के कारण शव सड़ने से बीमारी न फैले।
