क्रोध, मान, माया, लोभ का त्याग कर आत्मा को पहचाने: धैर्य मुनि

By :  vijay
Update: 2025-08-04 11:07 GMT

आसींद( सुरेन्द्र संचेती) व्यक्ति अपने घर में मूल्यवान एवं सारगर्भित वस्तु को सुरक्षित रखता है। इसी तरह हमारे शरीर में सबसे बड़ी आत्मा होती है जिसे सुरक्षित रखना चाहिए। आज के युग में लोग आत्मा की परवाह नहीं कर शरीर की परवाह अधिक करते है। जब तक जीवन में क्रोध, मान, माया, लोभ जैसे कषाय को समाप्त नहीं करेंगे तब तक आत्मा को नहीं पहचाना जा सकता है। हमारे जीवन जीने का एक लक्ष्य निर्धारित होना चाहिए बिना लक्ष्य के कोई भी चीज आसानी से प्राप्त नहीं की जा सकती है। लक्ष्य निर्धारित नहीं होने से व्यक्ति आज भटक रहा है। जैन आगम के अनुसार 8 प्रकार के कर्म होते है जिनमें चार घाती कर्म होते है इनको जीतने वाला अरिहंत बन जाता है। और 4 अघाती कर्मों को नष्ट करने वाला सिद्ध बन जाता है। जीवन को अच्छा बनाने के लिए लक्ष्य जरूर निर्धारित करना चाहिए। उक्त विचार नवदीक्षित संत धैर्य मुनि ने महावीर भवन में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए।

साध्वी ऋजु लता ने कहा कि श्रावकों को आगे बढ़ने के लिए दान, शील ,तप और भाव का होना जरूरी है। धर्म के कार्यों में दिया गया दान कभी भी व्यर्थ में नहीं जाता है। जितने कर्मों का क्षय होगा उतनी ही पुण्यवानी बढ़ती जायेगी। साध्वी ने आदर्श विवाह किसे कहते है और किन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए इस पर विस्तार से प्रकाश डाला। धर्म सभा में धीरज मुनि, प्रवर्तिनी डॉ. दर्शन लता, कल्पलता म.सा. उपस्थित थे।

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