भीलवाड़ा। आरजिया चौराहा स्थित निरंकारी सत्संग भवन पर भीलवाड़ा-कोटा जोन के इंचार्ज संत ब्रजराज सिंह ने भक्ति पर्व समागम के अवसर पर श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि भक्ति केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन जीने की सजग यात्रा है।
समागम के अवसर पर सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज एवं निरंकारी राजपिता रमित जी के पावन सान्निध्य में श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास की अनुपम छटा देखने को मिली। श्रद्धालुओं ने परम संत संतोख सिंह जी सहित अन्य संत महापुरुषों के तप, त्याग और ब्रह्मज्ञान के प्रचार-प्रसार में उनके योगदान का भावपूर्ण स्मरण किया और उनके जीवन से प्रेरणा लेकर भक्ति, सेवा एवं समर्पण के मूल्यों को अपनाने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम में अनेक वक्ताओं, कवियों और गीतकारों ने गुरु महिमा, भक्ति भाव और मानव कल्याण के संदेशों को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया। संतों की शिक्षाओं ने उपस्थित श्रद्धालुओं के हृदय को छूते हुए उनके जीवन को आध्यात्मिक दृष्टि से समृद्ध किया।
भक्ति की महिमा पर प्रकाश डालते हुए सतगुरु माता जी ने कहा कि भक्ति कोई नाम या दिखावा नहीं, बल्कि अपने भीतर की सजग यात्रा है। सच्ची भक्ति तब होती है जब हम आत्ममंथन द्वारा स्वयं की जाँच करें, अपनी कमियों को सुधारें और हर पल जागरूक जीवन जीएँ। जानबूझकर चोट पहुँचाना, बहाने या चालाक शब्द भक्ति नहीं हैं, क्योंकि भक्त का स्वभाव मरहम का होता है।
निरंकारी राजपिता जी ने बताया कि भक्ति कोई पद, पहचान या परिभाषा नहीं, बल्कि ब्रह्मज्ञान पाकर करता-भाव के समाप्त होने से उपजा जीवन जीने का ढंग है। उन्होंने समझाया कि भक्ति को उपलब्धियों या अहंकार से नहीं जोड़ा जाना चाहिए, बल्कि यह प्रेम का चुनाव है।
सतगुरु माता जी ने माता सविंदर जी एवं राजमाता जी के जीवन को भक्ति, समर्पण और निःस्वार्थ सेवा का प्रतीक बताते हुए कहा कि ये मातृशक्तियाँ निरंकारी मिशन के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।
निरंकारी मिशन का मूल सिद्धांत यही है कि भक्ति परमात्मा के तत्व को जानकर ही अपने वास्तविक और सार्थक स्वरूप को प्राप्त करती है। सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज के प्रवचनों ने श्रद्धालुओं को भक्ति के वास्तविक अर्थ को समझने और उसे दैनिक जीवन में अपनाने की प्रेरणा प्रदान की। इस अवसर पर भीलवाड़ा सहित आसपास के सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भक्ति पर्व और संत समागम का आनंद लिया।
