लोक सेवकों के खिलाफ शिकायत पर शपथ पत्र अनिवार्य, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम निर्णय में कहा कि यदि किसी लोक सेवक के खिलाफ उसके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए किसी कथित अपराध को लेकर शिकायत दर्ज कराई जाती है, तो उसके साथ शपथ पत्र देना अनिवार्य होगा। इस फैसले को भ्रष्टाचार और झूठे आरोपों पर रोक लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि न्यायिक अधिकारियों और अन्य लोक सेवकों के मामलों में अलग अलग मानक अपनाने का कोई तर्कसंगत आधार नहीं है। अदालत ने चीफ जस्टिस द्वारा सभी हाईकोर्ट को भेजे गए एक पुराने संचार का हवाला देते हुए कहा कि जब न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ शिकायतों में शपथ पत्र जरूरी माना गया है, तो लोक सेवकों के खिलाफ भी यही शर्त लागू होनी चाहिए।
पीठ ने स्पष्ट किया कि शपथ पत्र की यह अनिवार्यता झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों को छांटने के साथ साथ ईमानदार अधिकारियों को न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग से बचाने और दोषियों को कानून के दायरे में लाने के बीच संतुलन बनाने के उद्देश्य से रखी गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 175(3) के तहत दायर किसी भी आवेदन को मजिस्ट्रेट खारिज कर सकता है, यदि आरोप पूरी तरह से निराधार हों, स्पष्ट रूप से बेतुके हों या इतने असंभव हों कि कोई भी समझदार व्यक्ति यह मान ही न सके कि कोई अपराध हुआ है।
हालांकि अदालत ने यह भी चेताया कि शिकायत खारिज करने का निर्णय मनमाना नहीं होना चाहिए और उसके पीछे ठोस तथा वैध कारण होने चाहिए। अदालत ने याद दिलाया कि बीएनएसएस की धारा 175 पुलिस अधिकारियों को मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना संज्ञेय मामलों की जांच करने का अधिकार देती है, लेकिन इसके प्रयोग में सावधानी और न्यायिक संतुलन आवश्यक है।
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