उदयपुर: 55 वर्षीय आदिवासी महिला ने दिया 17वें बच्चे को जन्म, परिवार की बदहाली ने उठाए सरकारी योजनाओं पर सवाल

Update: 2025-08-27 09:50 GMT


उदयपुर जिले के आदिवासी बाहुल्य झाड़ोल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। 55 वर्षीय आदिवासी महिला रेखा कालबेलिया ने अपने 17वें बच्चे को जन्म दिया है। यह खबर न केवल स्थानीय लोगों के लिए चर्चा का विषय बन गई है, बल्कि यह सरकारी योजनाओं और सामाजिक जागरूकता की कमी को भी उजागर करती है।

परिवार की बदहाली और आर्थिक तंगी

रेखा कालबेलिया और उनके पति कवरा कालबेलिया का परिवार अत्यंत गरीबी और बदहाली में जीवन यापन कर रहा है। कवरा ने बताया कि उनके पास रहने के लिए अपना मकान तक नहीं है। परिवार की आजीविका भंगार इकट्ठा करने से चलती है। बच्चों के भरण-पोषण के लिए उन्हें साहूकारों से 20% ब्याज पर कर्ज लेना पड़ा, जिसके लाखों रुपये चुकाने के बावजूद ब्याज का बोझ खत्म नहीं हुआ है।

रेखा ने अब तक 16 बच्चों को जन्म दिया था, जिनमें से चार बेटों और एक बेटी की जन्म के बाद मृत्यु हो गई। उनके पांच बच्चे शादीशुदा हैं और उनके अपने बच्चे भी हैं। लेकिन शिक्षा के अभाव में परिवार के बच्चे स्कूल नहीं जा सके, जिससे उनकी स्थिति और दयनीय हो गई है।

सरकारी योजनाओं की नाकामी

कवरा ने बताया कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत उन्हें मकान तो मिला था, लेकिन जमीन उनके नाम न होने के कारण परिवार आज भी बेघर है। उन्होंने सरकार से मदद की गुहार लगाई है। यह मामला न केवल परिवार की आर्थिक तंगी को दर्शाता है, बल्कि ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी को भी उजागर करता है।

नसबंदी और जागरूकता की जरूरत

झाड़ोल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. रोशन दरांगी ने बताया कि रेखा के अस्पताल में भर्ती होने पर परिवार ने शुरू में इसे उनकी चौथी संतान बताया था। बाद में पता चला कि यह उनकी 17वीं संतान है। डॉ. दरांगी ने कहा कि अब रेखा और उनके पति को नसबंदी के लिए जागरूक किया जाएगा ताकि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचा जा सके।

सामाजिक और सरकारी जिम्मेदारी

यह घटना सरकार के "हम दो, हमारे दो" जैसे नारों और जनसंख्या नियंत्रण के लिए चलाई जा रही योजनाओं की पोल खोलती है। हर साल स्वास्थ्य विभाग द्वारा जागरूकता के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता का अभाव और गरीबी इस तरह के मामले सामने ला रहा है।

रेखा और कवरा का परिवार उन हजारों परिवारों का प्रतिनिधित्व करता है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। इस मामले ने न केवल स्थानीय प्रशासन बल्कि समाज के सामने भी एक बड़ा सवाल खड़ा किया है कि क्या हमारा सिस्टम वास्तव में इन जरूरतमंद लोगों तक पहुंच पा रहा है?

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