ईरान की बेटियों को निगल गया ये युद्ध,
माताएं हुई बेऔलाद किस पे होए क्रूद्ध।
प्यारी बिटिया! रोज स्कूल से लौटती थी,
भविष्य के 'ख़्वाब' बस्तों में समेटती थी।
आंगन में गूंजती सुखी जीवन की इबारतें,
बेटियों की खिलखिलाहटें पिता निहारते।
गोदी संवारती माताएं हरपल यूं पुकारती,
स्कूल भेज काले टीके से 'नजर' उतारती।
तुम्हारे बस्ते में बारूदी गंध मिश्रित हो गई,
वह स्लेट व कॉपी मलबे में ढेर हो खो गई।
ये इबारत लिख रहा स्कूल खंडहर हो गया,
बम धमाके से 'बेटियों' को दफ़न कर गया।
युद्ध जीतकर भी कोई जीता है यहाँ कभी,
लथपथ पड़ी लाशों का लहू पीता है कभी।
अमेरिका-इज़राइल शांति की ओर ही बढ़ो,
रोको ये खून-खराबा एक नई कहानी गढ़ो।
