भीलवाड़ा की गलियों में जिंदा 'मुर्दे' का जश्न: 426 साल पुरानी परंपरा में उड़ी गुलाल, जब अर्थी से उठकर फोटो खिंचवाने लगा युवक
शीतला सप्तमी पर चित्तौड़ वालों की हवेली से निकली अनोखी शवयात्रा; हंसी-ठिठोली और आतिशबाजी के बीच जीवंत हुई रियासतकालीन विरासत
भीलवाड़ा। वस्त्र नगरी भीलवाड़ा में बुधवार को एक ऐसा नजारा दिखा जिसने परंपरा और आधुनिकता के संगम को अनूठे ढंग से पेश किया। अवसर था शीतला सप्तमी का, जहाँ सदियों पुरानी 'मुर्दे की सवारी' (सनेती) निकालने की रस्म पूरी की गई। इस बार की सवारी में श्रद्धा के साथ-साथ युवाओं का उत्साह और तकनीक के प्रति प्रेम भी झलका, जब अर्थी पर लेटा 'नकली शव' अपनी फोटो खिंचवाने के लिए बार-बार कफन से बाहर झांकने लगा।
कफन के भीतर से मुस्कुराता चेहरा और गुलाल की बारिश
दोपहर बाद चित्तौड़ वालों की हवेली के पास से जब यह शवयात्रा शुरू हुई, तो माहौल गमगीन होने के बजाय उल्लास से भरा था। सनेती पर लेटा युवक आकर्षण का केंद्र रहा, जो बीच-बीच में अपना चेहरा कफन से बाहर निकालकर फोटो खिंचवाता नजर आया।
जब कंधे दे रहे युवक ऊपर से गुलाल बरसाते, तो वह युवक गुलाल से बचने के लिए झट से अपना चेहरा वापस कफन में छिपा लेता। यह दृश्य देख मार्ग में खड़े लोग अपनी हंसी नहीं रोक पाए।
इलाजी का पुतला और विलाप का स्वांग
यात्रा में आतिशबाजी और ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच रंगों का जबरदस्त सैलाब उमड़ा। वाहनों में भरे गुलाल के कट्टों से पूरी सड़कों को सराबोर कर दिया गया। यात्रा के दौरान वाहन पर रखा 'इलाजी' का पुतला विशेष आकर्षण का केंद्र रहा।
परंपरा को जीवंत बनाने के लिए कुछ युवा आगे-आगे मिट्टी की हांडी लेकर विलाप करने का स्वांग रच रहे थे, जिन्हें बुजुर्ग हंसी-ठिठोली करते हुए ढांढ़स बंधा रहे थे। यह अद्भुत नजारा शहर के मुख्य मार्गों, रेलवे स्टेशन चौराहा, गोलप्याऊ और भीमगंज से होते हुए बड़े मंदिर तक पहुंचा।
महिलाओं की एंट्री बैन: फब्तियों और कड़वाहट को मिटाने का माध्यम
पद्मश्री जानकीलाल भांड ने बताया कि यह परंपरा 426 वर्षों से अनवरत चली आ रही है। मंगलवार शाम को भैंरूजी के जागरण के बाद बुधवार को सर्राफा बाजार से यह सनेती निकाली गई। खास बात यह है कि इस आयोजन के दौरान जमकर हंसी-मजाक, फब्तियां और व्यंग्य का दौर चलता है, इसी कारण मर्यादा और लोक-मर्यादा के चलते महिलाओं का इस यात्रा में शामिल होना वर्जित माना जाता है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि इस रस्म को निभाने से समाज के आपसी मतभेद खत्म होते हैं और शहर में सुख-समृद्धि आती है।
अंत में 'मुर्दा' भागा, फिर हुआ दाह संस्कार
यात्रा का समापन बड़े मंदिर के पास बेहद रोचक रहा। जैसे ही अर्थी मंदिर पहुंची, उस पर लेटा युवक अचानक उठकर भाग गया। इसके बाद विधि-विधान से प्रतीकात्मक रूप से अर्थी का दाह संस्कार किया गया। इस पूरी यात्रा के दौरान युवक का कभी उठकर बैठना तो कभी पानी पीना लोगों के लिए रोमांच और मनोरंजन का स्रोत बना रहा।
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