मांडल में वर्षों की ऐतिहासिक परंपरा का शंखनाद: भव्य 'मांडल महोत्सव' में नाहर नृत्य मंगलवार को

Update: 2026-03-16 10:19 GMT

भीलवाड़ा । मेवाड़ के द्वार और अपनी अनूठी लोक परंपराओं के लिए विख्यात भीलवाड़ा जिले के मांडल कस्बे में आज चार सौ साल से भी अधिक पुरानी सांस्कृतिक विरासत 'नाहर नृत्य' का भव्य आयोजन होने जा रहा है। इस वर्ष प्रशासन के सहयोग से इसे 'मांडल महोत्सव' का रूप दिया गया है, जो कस्बे की ऐतिहासिक पहचान को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा।

शाहजहां के मनोरंजन से शुरू हुई थी परंपरा

इतिहास के पन्नों के अनुसार, इस नृत्य की शुरुआत करीब 412 वर्ष पूर्व सन 1614 में हुई थी। बताया जाता है कि जब मुगल बादशाह शाहजहां उदयपुर जाते समय मांडल में रुके थे, तब उनके मनोरंजन के लिए स्थानीय कलाकारों ने 'नरसिंह अवतार' का स्वांग रचा था। बादशाह इस कला से इतने अभिभूत हुए कि तब से यह आयोजन मांडल की वार्षिक परंपरा बन गया।

मंदिर से स्टेडियम तक बिखरेगी छटा

महोत्सव का मुख्य आकर्षण मंगलवार शाम को दिखाई देगा। कार्यक्रम की शुरुआत शेषसहाय मंदिर के सामने पारंपरिक नाहर नृत्य की प्रस्तुति से होगी। इसके पश्चात, रात्रि 8 बजे मांडल के खेल स्टेडियम में मुख्य समारोह आयोजित किया जाएगा। इस भव्य उत्सव में भाजपा नेताओं सहित कई जनप्रतिनिधि, जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी और बड़ी संख्या में श्रद्धालु शिरकत करेंगे।

विशिष्टता: पहले 'राम' फिर 'राज' के समक्ष नृत्य

नाहर नृत्य की अपनी एक धार्मिक मर्यादा है। परंपरा के अनुसार, कलाकार सबसे पहले "राम" (देवता) और उसके बाद "राज" (शासन/प्रशासन) के सामने अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। कलाकार अपने शरीर पर करीब 4 किलो रुई को सुतली की सहायता से लपेटकर शेर (नाहर) का रूप धारण करते हैं और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर थिरकते हैं।

दीपावली से भी बड़ा उत्सव, मेहमानों का सत्कार

मांडल वासियों के लिए यह दिन दीपावली से भी अधिक महत्व रखता है। कस्बे में 'अतिथि देवो भवः' की भावना के साथ घरों में विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं। लोग अपनी बेटियों, दामादों और रिश्तेदारों को विशेष रूप से आमंत्रित करते हैं। होली के 13 दिन बाद 'रंग तेरस' पर होने वाला यह आयोजन आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक एकता का जीवंत उदाहरण है।

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