मीडिया की ब्रेकिंग खबरों में कमजोरी, लोकल और राष्ट्रीय स्तर पर सवाल खड़े

Update: 2026-01-03 14:50 GMT


 पिछले एक दशक से मीडिया की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही है कि वह ब्रेकिंग खबरों में तेज़ी नहीं दिखा पा रहा। अब अधिकतर खबरें जनता तक केवल तभी पहुंचती हैं जब सरकार या सत्ताधारी पार्टी उन्हें आधिकारिक रूप से जारी करती है। नतीजतन, मीडिया अपने मूल उद्देश्य — तथ्य और जानकारी जनता तक समय पर पहुँचाना — में कमजोर पड़ता जा रहा है।

राष्ट्रीय स्तर पर उदाहरण:

यूपी बीजेपी अध्यक्ष पंकज चौधरी की ताजपोशी और बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन के नाम की घोषणा जैसी खबरों को मीडिया किसी भी सूत्र से पहले नहीं ब्रेक कर पाया।राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चयन, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों के चयन जैसे मामलों में भी मीडिया के पुराने सूत्र फेल रहे।विशेषज्ञ मानते हैं कि मीडिया के पारंपरिक नेता-मंत्री संबंध अब उतने प्रभावशाली नहीं रहे। खबरें डायरेक्ट रूट से बाहर पहुंच रही हैं, जिससे पत्रकारों को 'सबसे तेज' साबित होने का मौका ही नहीं मिल रहा।

लोकल स्तर की स्थिति:



 


स्थानीय स्तर पर भी स्थिति कुछ अलग नहीं है। कई शहरों और जिलों में प्रभावशाली या महत्वपूर्ण घटनाओं की खबरें दिन या दो दिन तक दबा दी जाती हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट मीडिया पर जब यह खबर फैलती है, तब ही स्थानीय पत्रकार उसे उठाने के लिए मजबूर होते हैं। उदाहरण के लिए, कई विधानसभाओं या जिला प्रशासन से जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाओं की सूचना स्थानीय मीडिया को आधिकारिक तौर पर मिलने में देरी होती है। इससे न केवल समय की बाध्यता बढ़ती है, बल्कि स्थानीय जनता तक भी खबर पहुँचने में देरी होती है।लोकल की बात कर तो पिछले कुछ समय  से बड़ी खबर है या प्रभावशाली या भुजबलियो की खबर को ब्रेक करना तो दूर दो दिन तक  पता  ही  लगती   है वह इंटर नेट   मिडिया पर ब्रेक होने पर खबर को चलाने के लिए मजबूर होना पड़ता है  चाहे  एचबीएस गेगे की खबर हो या विधायक की ऐसे मामले हे  जो ...!

विशेषज्ञों का कहना है कि यह मीडिया की अक्षमता, सूत्रों की कमजोरी या किसी अघोषित दबाव का संकेत हो सकता है। फिर भी उम्मीद है कि नए साल में मीडिया इस स्थिति से बाहर आएगा और अपने मूल कार्य — जनता को समय पर तथ्य और खबरें पहुँचाना — पर लौटेगा।

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