आप अप्रेल फूल के शिकार बन जाये और फिर ये सुनना पड़े की 'अप्रैल फूल बनाया....
एक अप्रेल को सम्भल कर रहना कोइ मुर्ख ने बना दे और आप उसके चक्क्र में चक्र गिनी बनते नजर आये,कुछ सालो पहले तक तो भीलवाड़ा के अखबारों में अप्रेल फूल बनाने के लिये हैः लाइने में खबर छपा करती थी ..अप्रैल फूल डे यानी 1 अप्रैल को लोगों को बेवकूफ बनाने का अंतरराष्ट्रीय त्योहार. कोई झूठी ख़बर फैला देता है, कोई नकली अफवाह उड़ा देता है, और फिर ठहाके लगते हैं – 'अप्रैल फूल डे यानी 1 अप्रैल को लोगों को बेवकूफ बनाने का अंतरराष्ट्रीय त्योहार. कोई झूठी ख़बर फैला देता है,

कोई नकली अफवाह उड़ा देता है, और फिर ठहाके लगते हैं – 'अप्रैल फूल बनाया!' लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि यह दिन मनाने की ज़रूरत क्यों पड़ी? और अगर इतिहास में कुछ खास घटनाएं न घटी होतीं, तो शायद आज दुनिया में अप्रैल फूल डे का नामो-निशान भी न होता! कैसे हुई अप्रैल फूल डे की शुरुआत? अप्रैल फूल डे की शुरुआत को लेकर कई कहानियां हैं, लेकिन सबसे ज़्यादा मानी जाने वाली थ्योरी जुड़ी है कैलेंडर बदलने की घटना से. 1. कैलेंडर कन्फ्यूजन – अगर यह न होता, तो कोई मज़ाक न उड़ाता! 16वीं शताब्दी में यूरोप में लोग पुराने जूलियन कैलेंडर के हिसाब से 1 अप्रैल को नया साल मनाते थे. लेकिन 1582 में पोप ग्रेगरी XIII ने ग्रेगोरियन कैलेंडर लागू कर दिया, जिससे नया साल 1 जनवरी को शिफ्ट हो गया. समस्या यह थी कि उस समय संचार के साधन आज जैसे नहीं थे. न मोबाइल था, न इंटरनेट, और न ही ब्रेकिंग न्यूज़! कई लोगों को यह बदलाव समय पर पता ही नहीं चला, और वे अब भी 1 अप्रैल को नया साल मनाते रहे. इस पर बाकी लोग उनका मज़ाक उड़ाने लगे और उन्हें ‘अप्रैल फूल’ कहा जाने लगा. यही सिलसिला धीरे-धीरे परंपरा बन गया. अब सोचिए, अगर पोप ग्रेगरी XIII ने कैलेंडर न बदला होता, तो लोग 1 अप्रैल को नया साल मनाते रहते. कोई उनका मज़ाक नहीं उड़ाता और शायद अप्रैल फूल डे कभी जन्म ही नहीं लेता! 2. मछलियों का मज़ाक – अगर यह न होता, तो फ्रांस में भी कोई हंसी-ठिठोली न करता! फ्रांस में अप्रैल फूल को 'Poisson d’Avril' यानी 'अप्रैल की मछली' कहा जाता है. पुराने समय में 1 अप्रैल के आसपास मछलियों का शिकार आसान होता था, क्योंकि वे बड़ी तादाद में पकड़ में आ जाती थीं. फ्रेंच लोग इस बात का मज़ाक उड़ाने के लिए 1 अप्रैल को लोगों की पीठ पर कागज़ की मछली चिपकाकर उन्हें 'अप्रैल फूल' बना देते थे. अगर यह परंपरा शुरू न हुई होती, तो फ्रांस में अप्रैल फूल की शरारतें शायद कभी ट्रेंड में न आतीं! 3. ब्रिटिश मीडिया और 18वीं शताब्दी की अफवाहें – अगर यह न होता, तो दुनिया भर में अप्रैल फूल न फैलता! अप्रैल फूल डे ब्रिटेन और अमेरिका में 18वीं शताब्दी में खूब लोकप्रिय हुआ. 1700 के दशक में ब्रिटिश अखबारों ने झूठी खबरें छापनी शुरू कीं, जिनका मकसद सिर्फ लोगों को मूर्ख बनाना था. धीरे-धीरे यह मीडिया ट्रेंड बन गया और पूरी दुनिया में फैल गया. अब सोचिए, अगर ब्रिटिश मीडिया यह फेक न्यूज़ ट्रेंड न शुरू करता, तो शायद अप्रैल फूल मीडिया में पॉपुलर ही नहीं होता! अगर ये सब न हुआ होता, तो आज की दुनिया कैसी होती? कोई 1 अप्रैल को गूगल पर 'मजेदार प्रैंक आइडिया' नहीं खोजता! कोई न्यूज़ चैनल फेक रिपोर्टिंग करके अप्रैल फूल स्पेशल शो नहीं बनाता! कोई यूट्यूबर प्रैंक वीडियो बनाकर मिलियन व्यूज़ नहीं लेता! और कोई यह आर्टिकल भी नहीं पढ़ रहा होता! अप्रैल फूल क्यों ज़रूरी है? अगर कैलेंडर कन्फ्यूजन, मछलियों का मज़ाक और ब्रिटिश मीडिया की अफवाहें न होतीं, तो शायद आज हम अप्रैल फूल डे नहीं मना रहे होते. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है – यह दिन हमें याद दिलाता है कि हल्का-फुल्का मज़ाक ज़रूरी है, लेकिन झूठ और अफवाहों की एक लिमिट होनी चाहिए. तो अगली बार जब आप किसी को अप्रैल फूल बनाएं, तो सोचिए – अगर इतिहास में ये घटनाएं न घटी होतीं, तो आज आप यह मज़ाक कर भी रहे होते या नहीं? चोकने रहिये कल यानि मंगल को कोइ खबर दंगल न कर दे और आप अप्रेल फूल के शिकार बन जाये और फिर ये सुनना पड़े की 'अप्रैल फूल बनाया....