सावधान! मोबाइल गेम की आभासी दुनिया कर रही है बच्चों का दिमाग 'हाइजैक', खत्म हो रहा है मौत का खौफ
गाजियाबाद/इलाहाबाद: गाजियाबाद में तीन सगी बहनों द्वारा एक साथ आत्महत्या करने की झकझोर देने वाली घटना ने ऑनलाइन गेमिंग के काले सच को उजागर कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि मोबाइल गेम अब महज मनोरंजन नहीं, बल्कि बच्चों के दिमाग को नियंत्रित करने वाला एक खतरनाक टूल बन चुके हैं।
डिजिटल नशा: मौत भी लगने लगती है 'गेम' का हिस्सा
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर संदीप आनंद के अनुसार, ऑनलाइन गेम इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि बच्चा धीरे-धीरे असल दुनिया से कट जाता है। गेम की आभासी दुनिया उसे इतनी वास्तविक लगने लगती है कि उसका अपनी चेतना (Ego) से संपर्क टूट जाता है। ऐसी स्थिति में, गेम में बार-बार मरने और फिर जी उठने की प्रक्रिया से बच्चे के मन से 'वास्तविक मृत्यु' का डर पूरी तरह समाप्त हो जाता है।
डोपामाइन का खतरनाक खेल
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि गेम खेलते समय मिलने वाली चुनौतियों और जीत से मस्तिष्क में 'डोपामाइन' हार्मोन का भारी स्राव होता है। यह हार्मोन बच्चों के भीतर आवेग (Impulse) को इतना बढ़ा देता है कि वे बिना सोचे-समझे आत्मघाती कदम उठा लेते हैं।
शेयर्ड साइकोसिस: जब सामूहिक भ्रम बन जाए जानलेवा
प्रोफेसर आनंद ने बताया कि जब भाई-बहन या दोस्त एक साथ एक ही गेमिंग दुनिया में रहते हैं, तो वे 'शेयर्ड साइकोसिस' का शिकार हो सकते हैं। इसमें एक बच्चे का भ्रम या सनक दूसरे बच्चे को भी मानसिक रूप से संक्रमित कर देती है, जिससे वे सामूहिक रूप से जानलेवा फैसले ले लेते हैं।
बचाव के लिए विशेषज्ञों की सलाह:
स्क्रीन टाइम का निर्धारण: बच्चों के लिए मोबाइल इस्तेमाल का समय सख्ती से तय करें।
व्यवहार पर नजर: यदि बच्चा गुमसुम रहे या चिड़चिड़ा हो जाए, तो इसे सामान्य न समझें।
गोल्डन रूल: माता-पिता सप्ताह में कम से कम 4-5 घंटे बच्चों के साथ बिना मोबाइल के बिताएं।
प्रथम मनोवैज्ञानिक सहायता: व्यवहार में बदलाव दिखने पर तुरंत विशेषज्ञों या काउंसलर की मदद लें।
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