धनोप माता मंदिर: ऐतिहासिक वैभव और शक्ति पूजा का संगम, होली पर हुआ देवी का अद्भुत श्रृंगार

Update: 2026-03-03 09:26 GMT


फूलियाकलां (राजेश शर्मा)। "अन्न धन सुख सम्पदा, महिमा मात अनोप! द्वार खुला निश दिन रहे, धन धन मात धनोप!!"

राजस्थान की वीर प्रसूता माटी में शक्ति की आराधना सदियों से रची-बसी है। इसी गौरवशाली परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र है भीलवाड़ा जिले के शाहपुरा से 30 किमी दूर स्थित धनोप माता मंदिर। ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टिकोण से समृद्ध यह स्थान न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि अपने भीतर प्राचीन ताम्बवती नगरी का इतिहास भी समेटे हुए है।

ताम्बवती नगरी और राजा धुंध का इतिहास

पौराणिक मान्यताओं और जनश्रुतियों के अनुसार, प्राचीन काल में यह क्षेत्र 12 कोस की परिधि में फैला एक भव्य नगर था, जिसे ताम्बवती नगरी कहा जाता था। यहाँ के प्रतापी राजा धुंध के नाम पर ही इस स्थान का नाम 'धनोप' पड़ा। खारी और मानसी नदियों के संगम तट पर बसा यह नगर कभी सुंदर भवनों, बावड़ियों और मंदिरों से सुशोभित था। पुरातात्विक खुदाई में यहाँ से कलात्मक मूर्तियाँ, सिक्के और अलंकृत झरोखे मिलना इस बात की पुष्टि करते हैं कि अतीत में यह एक अत्यंत समृद्धशाली नगर रहा होगा।

मंदिर की विशेषताएँ और अनूठा श्रृंगार

धनोप माता मंदिर एक ऊंचे रेतीले टीले पर स्थित है। वर्तमान पुजारी योगेश कुमार ने बताया कि यहाँ पूर्वाभिमुख प्रतिमाओं में अष्टभुजाजी, अन्नपूर्णाजी, चामुण्डाजी, महिषासुर मर्दिनी और श्री कालका जी की कलात्मक प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित हैं। मंदिर से जुड़ी कुछ खास बातें इस प्रकार हैं:

भव्य श्रृंगार: देवी का श्रृंगार सवा मन पुष्पों और नीम व कांटेदार वृक्षों को छोड़कर अन्य वनस्पतियों से किया जाता है। माता को नित्य 18 मीटर की पोशाक धारण कराई जाती है।

ब्रह्मचर्य और ओसरा परंपरा: यहाँ पुजारी परिवार के 20 सदस्य हैं, जिनका दो-दो माह का सेवा (ओसरा) काल आता है। सेवा के दौरान पुजारी को मंदिर परिसर में ही रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य होता है।

ऐतिहासिक सभामण्डप: मंदिर का विशाल सभामण्डप दिल्ली के अंतिम हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) के शासनकाल में निर्मित माना जाता है।

होली पर 'रंगोत्सव' श्रृंगार और मंदिर विस्तार

होली के पावन पर्व पर पुजारी प्रभाकर दाधीच द्वारा माता का विशेष 'रंगोत्सव श्रृंगार' किया गया, जो भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। वहीं, मंदिर के विकास कार्यों को लेकर पुजारी योगेश कुमार शर्मा (पण्डा) ने बताया कि निर्माण कार्य युद्धस्तर पर जारी है। आगामी नवरात्र तक निज परकोटे का कार्य पूर्ण कर लिया जाएगा, जिसके पश्चात भव्य गुंबद (शिखर) का निर्माण शुरू होगा।

यहाँ बलि प्रथा पूर्णतः बंद है और प्रत्येक नवरात्र में विशाल मेले का आयोजन होता है, जहाँ हजारों श्रद्धालु मन्नतें मांगने पहुँचते हैं। यात्रियों के ठहरने के लिए मंदिर ट्रस्ट द्वारा धर्मशालाओं और विश्रामगृहों की समुचित व्यवस्था की गई है।

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