आरजीएचएस का बजट 346 करोड़ से बढ़कर 3400 करोड़ पहुँचा, फिर भी मरीज, अस्पताल और सरकार तीनों परेशान
जयपुर/भीलवाड़ा। राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (RGHS) अपने तीन साल के सफर में वित्तीय रूप से भारी भरकम बोझ बन चुकी है, लेकिन धरातल पर संतुष्टि का अभाव बना हुआ है। योजना का सालाना भुगतान 346 करोड़ रुपये से शुरू होकर अब करीब 3400 करोड़ रुपये तक पहुँच गया है। पिछले दो सालों में ही सरकार ने अस्पतालों और फार्मेसियों को 7200 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया है, फिर भी व्यवस्थाएं पटरी पर नहीं लौट पा रही हैं।
आंकड़ों में उछाल, सुविधाओं में अड़चन
पिछले तीन वर्षों में योजना का दायरा तेजी से बढ़ा है:
लाभार्थी: 12.35 लाख से बढ़कर 13.61 लाख हुए।
इलाज पैकेज: 2,129 से बढ़कर 3,367 तक पहुँचे।
अस्पताल: 1,500 से बढ़कर 1,729 हो गए।
इसके बावजूद, निजी अस्पताल कैशलेस इलाज को बंद कर 'पुनर्भरण' (रिइम्बर्समेंट) प्रणाली लागू करने की मांग पर अड़े हैं। वहीं, कैशलेस ओपीडी दवा वितरण का बहिष्कार भी जारी है, जिसमें 15 मई से पूर्ण बहिष्कार की चेतावनी दी गई है।
तीन पक्ष और तीनों की अपनी पीड़ा
1. मरीज: हक के बावजूद दर-दर की ठोकरें
कैशलेस सुविधा होने के बाद भी कई अस्पताल भुगतान में देरी का बहाना बनाकर इलाज से मना कर रहे हैं या मरीजों से अतिरिक्त वसूली कर रहे हैं।
छोटे शहरों में विकल्प सीमित होने से मरीजों को मजबूरन बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है।
टीआईडी जनरेशन और ऑनलाइन दस्तावेज अपलोड करने जैसी जटिल प्रक्रिया के कारण गंभीर स्थिति में भी इलाज में देरी हो रही है।
2. अस्पताल: करोड़ों का बकाया और कम पैकेज दरें
मंझले और छोटे निजी अस्पतालों का करोड़ों का भुगतान अटका हुआ है, जिससे स्टाफ की सैलरी और दवाओं का खर्च निकालना मुश्किल हो रहा है।
अस्पतालों का दावा है कि सरकारी पैकेज दरें वास्तविक ऑपरेशन और इलाज की लागत से काफी कम हैं।
3. सरकार: बढ़ता वित्तीय बोझ और फर्जी क्लेम
सरकार के लिए लगातार बढ़ता खर्च और फर्जी क्लेम पर लगाम लगाना बड़ी चुनौती बन गई है।
अधिकारियों पर आरोप लग रहे हैं कि वे बजट बढ़ने के मुख्य कारण 'प्रोपेगेंडा मेडिसिन' पर रोक लगाने के बजाय अस्पतालों पर एआई (AI) निगरानी का जाल बिछाने में व्यस्त हैं।
फिलहाल, आरजीएचएस योजना वित्तीय अनुशासन और बेहतर स्वास्थ्य सुविधा के बीच संतुलन बनाने के लिए संघर्ष कर रही है। यदि समय रहते निजी अस्पतालों और फार्मेसियों की समस्याओं का समाधान नहीं हुआ, तो लाखों सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए स्वास्थ्य सेवाएं संकट में पड़ सकती हैं।
