हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी: 'मियां-बीवी राजी, तो क्या करेगा काजी'—तलाक के मामले में मेड़ता कोर्ट का आदेश रद्द
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने मेड़ता फैमिली कोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया है, जिसमें एक मुस्लिम दंपती को आपसी सहमति (मुबारत) से तलाक देने से इनकार कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में तल्खी दिखाते हुए कहा कि जहां मियां-बीवी राजी हों, वहां अदालत को तकनीकी अड़चनें पैदा नहीं करनी चाहिए।
क्या था पूरा विवाद?
मामला पाली के निवासी आयशा चौहान और वसीम खान से जुड़ा है, जिनका निकाह फरवरी 2022 में हुआ था। विचारों के मतभेद के कारण दोनों साथ रहने में असमर्थ थे। शरीयत के अनुसार, पति ने तीन अलग-अलग 'तुहर' में तलाक बोला और बाद में दोनों ने अगस्त 2024 में 500 रुपये के स्टाम्प पेपर पर आपसी सहमति से 'मुबारतनामा' (तलाकनामा) तैयार किया। जब वे इसे कानूनी मान्यता दिलाने फैमिली कोर्ट पहुंचे, तो वहां उनकी अर्जी खारिज कर दी गई।
फैमिली कोर्ट की बड़ी गलती: सुन्नी दंपती पर थोपा शिया कानून
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि मेड़ता फैमिली कोर्ट ने इस अर्जी को यह कहते हुए खारिज किया था कि तलाक के समय गवाह मौजूद नहीं थे। हाईकोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि:
निचली अदालत ने जिन नियमों का हवाला दिया, वे 'शिया मुस्लिम लॉ' के हैं, जहां गवाह अनिवार्य होते हैं।
यह दंपती 'सुन्नी' (हनफी स्कूल) का अनुयायी है, जहां लिखित या मौखिक तलाक की वैधता के लिए गवाहों की उपस्थिति अनिवार्य शर्त नहीं है।
अदालत का फैसला
हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट का काम विवाद सुलझाना है, न कि रजामंद पक्षकारों के बीच बेवजह की बाधाएं डालना। अदालत ने मेड़ता कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए दंपती के तलाक को कानूनी मान्यता प्रदान की है।
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