ओपिनियन

कैमरे और आईने का डर, कलई और पोल-पट्टी खोलने को रहते हैं आतुर
देश का क्या दे रहे हैं, मुफ्त में लेने के लिए खड़े हैं कतार में ?
 मैं भी चुनाव लड़ने का सोच रहा हूं, जनसेवा की थाली में परोसी जा रही लाभ की रोटी और लोभ की सब्जी
अनहोनी का होना, होनी का न होना
किसी के लिए नहीं.. ये गीत.. पहाड़ो के लिए.. ईश्वर के लिए .. मेरा गिफ्ट
पुलिसवाला बन जाये तो कई फायदे
इस बार तो गर्मी ने हद कर दी..
उबलती, तड़फती भावना....
सर्दी में शादी को टालना ही पड़ेगा
राजनीति के मछुआरों को पालती बड़ी मछलियां
चुनाव की लहरें जब चलने लगे..
काट जरूरी है बेशर्म रंग की